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द्रोण भी मैं बन जाऊँगा!

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हे पुत्र तुम्हारे प्रेम-बद्ध, द्रोण भी मैं बन जाऊँगा गोधूम चूर्ण न बने भाग्य! चाकर भी बन जाऊँगा हो जिसे समझना जो कुछ भी, मुझे चिंतना तेरी है बने मनुज तू, धर्म जिये, पावन संस्कार दिलाऊँगा कर्म पथ तू बढ़े पुण्य के, नित नए प्रतिमान गढ़े परन्तु अहित जो तेरा हो, मैं रण विकट रचाऊँगा तू मान धरे कुल वसिष्ठ का, नित नए प्रतिमान गढ़े तेरे चरित्र को उज्ज्वल करने, प्रतिमान स्वयं बन जाऊँगा माधव सा हो पुत्र मेरा, ले आस तुम्हें मैं पोष रहा जो आतप-वर्षा-शीत सताये, शेषनाग बन जाऊँगा त्यागी हूँ मैं, लोभ परे, धन, यश की ना इच्छा है परन्तु तेरे पालन के हित, जीत स्वर्ग भी लाऊँगा कभी तुम्हारे दादा ने मुझे लिए जो स्वप्न गढ़े वही स्वप्न मैं पुत्र मेरे! थाती में दे जाऊँगा ©तुम्हारा पिता