श्रावण मास के पूर्णिमा का चाँद घने काले घहराते बादलों के बीच लुकाछिपी खेल रहा था। क्षणभर को दिखाई देता था, पुनः स्याह काले बादलों के पीछे चला जाता था! जैसे उसे शीघ्रता थी अंधेरे को चुन लेने की! अपने घर के दूसरे तल की बालकनी में खड़ी वाणी चाँद के इस खेल को देखे जा रही थी! " क्यों चले गए वीरक? क्यों? क्या एक पल भी अपनी वाणी का ध्यान नहीं आया?" अभी स्टेशन पर घटी घटना को एक दिन ही हुए थे! वाणी के लिए विश्वास कर पाना भी कठिन था, असम्भव ही था कि वीरक नहीं रहा! कोई माध्यम भी तो नहीं था, कि ज्ञात हो कि हुआ क्या? कैसे हुआ? सबकुछ जो एक सपना लग रहा, क्या वह सत्य था? सब आँखों के सम्मुख ही तो हुआ था! शर्मा अंकल भी तो थे! " मुझे याद कर रही वाणी?" सहसा कानों में गूँजी वह आवाज, जिसे वाणी आजीवन सुबह-शाम सुनना चाहती थी! " वीरक?" " और कौन पगली?" वाणी ने मुड़कर रेलिंग के दाहिने छोर की ओर देखा तो सन्न रह गयी! हँसे कि रोये? खुश हो कि उलाहना दे? कुछ भी उसकी समझ में नहीं आ रहा था! सामने रेलिंग से पीठ टिकाये वह खड़ा था, जिसके सीने से लगकर एक-एक पल बिताने का सोचा था व...