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प्रेम का मोल - 1

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#प्रेम_का_मोल  सन 2019 ई, माघ मास में इस बार जाह्नवी का जल अभी उतना भी उतरा नहीं था, पिछले दिनों हुई वर्षा ने जलस्तर में कुछ वृद्धि अवश्य कर दी थी! किसीको ज्ञात नहीं था कि एक कोरोना नाम की महामारी बस दस्तक देने वाली थी!   अहर्निश लोगों के आने जाने से गुलजार रहने वाले वाराणसी के वे घाट भी जनशून्य होने वाले थे!  वर्षों बाद कोई उन घाटों पर लौटा था, जो प्रातः उन्हीं चिरपरिचित सीढ़ियों पर बैठा, उठती गिरती जलतरंगों में खोया हुआ था! सहसा एक छवि उसके और माँ जाह्नवी के बीच आकर खड़ी हो गयी! " तुम्हें तो जानती हूँ! नाम याद नहीं आ रहा!  अरे हाँ! वही लाल पोटली वाला, जो उसमें अपने बाल देके चला गया था! बड़े वीयर्ड आदमी हो भई! तुम्हे उसके बाद खोजती रह गई और आज मिले हो चार साल बाद!" " मुझे कोई क्यों ढूँढेगा? " " अरे भई! तुमने उसदिन कुछ ऐसा कर ही दिया था! अब कौन भला उस आदमी को भूल सकता है, जो अपने बालों की प्रशंसा करने पर वो बाल ही हाथ में धर जाए! " " वैसे नाम तो बता दो यार! उस दिन यूँ ही चले गए! मेरा तो नाम नम्रता है!" सामने से कोई उत्तर पाता ना देख, उस अल्हड़ से स्व...

प्रेम हमारा त्रिक अणुओं सा

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प्रेम हमारा त्रिक-अणुओं सा क्यूँ है?- *************************** तुम्हें तब भी प्रेम किया जब तुमसे रुष्ट था। जब तुमसे रुष्ट था, उस पल भी तुमसे प्रेम किया। ये प्रेम हमारा त्रिक अणुओं सा क्यूँ है? आकर्षण में प्रतिकर्षण, प्रतिकर्षण में भी आकर्षण जितना तुमसे विरह में तपा समीप आया उतना ही तुम्हारे जितना तुम्हारे समीप आया उतना ही संकोच ने सिकोड़कर दूर किया ये प्रेम हमारा भौतिकी के नियमों सा क्यूँ है? इतिसिद्धम होकर भी सिद्ध नहीं जितना ही तपता हूँ, उतना ही शीतल होता हूँ एक संतोष के तोष से जितना ही शीतल होता हूँ, उतना ही एण्ट्रॉपी मुझे आकुल कर देती है तुम्हारे प्रेम की! ये प्रेम हमारा ऊष्मागतिकी के नियमों सा क्यूँ है? तपता हूँ शीतल होने के लिए, शीतल होता हूँ विरह में तपने के लिए ये प्रेम हमारा कभी रुद्धोष्म  तो कभी समतापी सा क्यों है कभी केवल प्रेम पाने की एषणा कभी जितना मिले उससे अधिक देने की चाहना ये प्रेम हमारा भौतिकी के नियमों सा क्यूँ है? क्यूँ है ये प्रेम निश्चित होकर भी इतना अनिश्चित? ✍️ देव चित्र साभार बिस्वाल भैया की भित्ति से

प्रियतमा

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प्रिय-रंजनी मन-मंजनी सुवदन तुम्हारा मन मोहे देख तुम्हारे चितवन को हिय भूल सुधि सुधबुध खोये कमलपुष्प पे भ्रमर की भाँति चित्त अनुरक्त है रूप तुम्हारे लास्य भाव, चंचल-चितवन, बहुविध-भङ्ग हैं नयन सखारे व्यालप्रिया से केश सज्ज, गजगामिनी, मदमत्त नयन क्षीणकटि, उन्नत-वक्ष, ज्यों गिरिवर-शृंग उत्थित-मगन मदिरा-कुल से सिक्त वायु सी, विकीर्ण हो रही गन्धउर्मियाँ  संग तुम्हारा मधुशाला सा, मद्यप से विस्मृत विधि की निधियाँ ©देव (चित्र गूगल से साभार)