प्रियतमा

प्रिय-रंजनी मन-मंजनी सुवदन तुम्हारा मन मोहे
देख तुम्हारे चितवन को हिय भूल सुधि सुधबुध खोये

कमलपुष्प पे भ्रमर की भाँति चित्त अनुरक्त है रूप तुम्हारे
लास्य भाव, चंचल-चितवन, बहुविध-भङ्ग हैं नयन सखारे

व्यालप्रिया से केश सज्ज, गजगामिनी, मदमत्त नयन
क्षीणकटि, उन्नत-वक्ष, ज्यों गिरिवर-शृंग उत्थित-मगन

मदिरा-कुल से सिक्त वायु सी, विकीर्ण हो रही गन्धउर्मियाँ 
संग तुम्हारा मधुशाला सा, मद्यप से विस्मृत विधि की निधियाँ


©देव

(चित्र गूगल से साभार)

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