सदियों तक फैली भूख
दूर कहीं उठता धुँआ सदियों तक फैली भूख मेरी गहन कान्तर में भटकता मैं जन्मों से, कल्पों से, योनियों से पर ये भूख, अंत नहीं इसका कहीं दूर उठते धुएँ को देख हृदय की आस कुलबुलाने लगी अब मिटेगी, कभी न मिटने वाली ये भूख, ये मेरी जन्मों की भूख परन्तु, जब गया मैं उस कुटिया में, देखा! जीर्ण-शीर्ण! स्यात वर्षा में टपकते हुए छज्जे को जिनसे कहीं कहीं महीन धूप छीज के भूमि के सिलन को खा रही थी एक कोने में बैठी थी माँ! घेरे हुए बैठे थे चार शिशु! भूख से श्लथ मुख लिये उस पात्र में, लकड़ी की मद्धिम आँच पर पक रहा था दो मुट्ठी चावल और नमक और पक रही थी भूख! उन आठ आँखों की कि बस! अब भूख कटने वाली है! कई दिनों की भूख, भिक्षा के उस चावल से जो मिली थी दुत्कार की दृष्टि के संग पर द्वार पर खड़ा मैं सोच रहा था! बुदबुदाते माढ़ की उस महक से क्या मेरी ही रसना सक्रिय हुई थी? या सक्रिय हुई थी भूख की इच्छा उस छोटे से कुटीर संसार की मैं भूखा! कल्पों से न मिटने वाली भूख लिए द्वार पे खड़ा, निरख रहा था भूख को, बुदबुदाते माढ़ को किसका अंत होगा मेरी भूख, जिसका अंत नहीं उन आठ आँखों की प्रतीक्षा का उन ममतामयी आँखों में बसने वाली...