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Showing posts from February, 2020

सदियों तक फैली भूख

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दूर कहीं उठता धुँआ सदियों तक फैली भूख मेरी गहन कान्तर में भटकता मैं जन्मों से, कल्पों से, योनियों से पर ये भूख, अंत नहीं इसका कहीं दूर उठते धुएँ को देख हृदय की आस कुलबुलाने लगी अब मिटेगी, कभी न मिटने वाली ये भूख, ये मेरी जन्मों की भूख परन्तु, जब गया मैं उस कुटिया में, देखा! जीर्ण-शीर्ण! स्यात वर्षा में टपकते हुए छज्जे को जिनसे कहीं कहीं महीन धूप छीज के भूमि के सिलन को खा रही थी एक कोने में बैठी थी माँ! घेरे हुए बैठे थे चार शिशु! भूख से श्लथ मुख लिये उस पात्र में, लकड़ी की मद्धिम आँच पर पक रहा था दो मुट्ठी चावल और नमक और पक रही थी भूख! उन आठ आँखों की कि बस! अब भूख कटने वाली है! कई दिनों की भूख, भिक्षा के उस चावल से जो मिली थी दुत्कार की दृष्टि के संग पर द्वार पर खड़ा मैं सोच रहा था! बुदबुदाते माढ़ की उस महक से क्या मेरी ही रसना सक्रिय हुई थी? या सक्रिय हुई थी भूख की इच्छा उस छोटे से कुटीर संसार की मैं भूखा!  कल्पों से न मिटने वाली भूख लिए द्वार पे खड़ा, निरख रहा था भूख को, बुदबुदाते माढ़ को किसका अंत होगा मेरी भूख, जिसका अंत नहीं उन आठ आँखों की प्रतीक्षा का उन ममतामयी आँखों में बसने वाली...

लोकतंत्र सपेरे की बीन

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लोकतंत्र की रीत!  बड़ी विचित्र! विधाता विस्मित! कहते हैं! लोक का है राज लोक ही करते लोक का काज क्या सत्य? लोक के राज में तंत्र का है बोलबाला लोक है विस्मृत बुझे न कोई! दिग्भ्रमित, मूढ़-खचित, मतवाला! भेड़िया-धसान अनेकों प्रमाण चार वर्ष और छः मास जनता के जीवन का विकट त्रास नेताओं का मधुमास! जब आते हैं अंत के दिन सपेरा निकलता ले हाथ में बीन बजाता है धुन मोहिनी मुफ्त की बिजली मुफ्त का पानी हर बार की यही कहानी जन में से निकलते हैं लोग भागे करते मुक्त का भोग जैसे सर्प को सपेरा नचाता है बना नर्तकी लोक नचाता है विस्मृत करता है वह भोग चार वर्ष छः मासे भुगता था जो रोग मुक्त के फेरे में  विस्मृत होता है सब त्रास लोक ही बनते लोक की फाँस है जादूगर का मायाजाल लोक उचारे लोक की खाल जैसे कुकुर लेता है अपने ही रक्त का रस जनता निज को चूसे बने स्वयं ही मस भूल वो जाता है फिर पाछे पछताता है पर पुनः कहानी दोहराएगी अंत छह मास के छल में चौवन मास भुलायेगी भेड़िया-धसान की ये कहानी फिर फिर दोहराई जाएगी फिर फिर दोहराई जाएगी ©देव चित्र साभार गूगल से

अब तुम कम याद आते हो!

अब तुम कम याद आते हो, किसी नदी के रेत के टीले से, जिसपर कभी बैठते थे हम जिसपे कभी पड़े थे निशान! साथ-साथ तेरे मेरे कदमों के हाँ, अब तुम कम याद आते हो वह बहकती हवा का चलना, तेरे आने का अंदेशा वह सीढ़ियों की खटपट, और तेरे आने का संदेशा सही कहा! अब तुम कम याद आते हो घिर के जो आये बादल, वो पानी की बूँदें वो तेज बरसाती झोंका, और तेरी चितवन सही कहा! अब तुम कम याद आते हो तुम्हारी तस्वीर को अबतक दीमक ना लगने दिया किसी मोरपंख सा सजा के रखा है उन्हें बटुए के तहखाने में हाँ! सही कहा! अब तुम कम याद आते हो दुनिया ने झिंझोड़ा है भीतर तक मुझे,  तिनका तिनका सा हो गया हूँ फिर भी सँजो के रखा है सीने में तुझे, सहेज कर हाँ! सही कहा! अब तुम कम याद आते हो क्योंकि याद आने के लिए भूलना है जरूरी साँसों के साथ चलते हो तुम धड़कन के संग धड़कते हो तुम तुम्हें भूला ही कब, कि याद करूँ हाँ! सही ही कहा! अब तुम कम याद आते हो! अब तुम कम याद आते हो! ©देव

पता है तुम्हें?

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पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम क्या है? क्या है किसीके प्रेम में होना? पर जानता हूँ इतना कि, जब तुम्हारे कुंतल से छनकर आती धूप मेरे मुख पर पड़ती है तो, सादियों से जमी मेरे हृदय की परत पिघलने लगती है, और मुझे आभास कराती है मेरे जीवित होने का पता है तुम्हें! जब गर्म दोपहरी में यही केश मेरे मुख पर पड़ती धूप को अपनी छाया से हर लेते हैं तो, हर लेते हैं जीवन के संघर्षों से उपजी तपन को, शीतल कर देते हैं मेरे हृदय के ताप को, संतोष के सुख से भर देते हैं, जिसे जाना न था कभी पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम क्या है? पर जब तुम मेरे हाथों को अपने कोमल हाथों में लेती हो, रोम रोम हर्षित हो जाते हैं मेरे, जो मृत ही पड़े थे सदैव से तुम्हारे हाथों की रेखाओं में दिखता है भाग्य मेरा, प्रकाश से भरा हुआ, जिसमें था केवल अँधियारा पसरा हुआ पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम में होना क्या है? पर, जब तुम आती हो एक साँस सी आती है साथ तुम्हारे, नहीं तो एक शव ही तो था तुम्हारे आने से पहले, एक चलता फिरता, भावहीन मुख वाला शव परन्तु आज आनन्द से नाचता है अस्तित्व मेरा, जीवन है मेरे कोशों में, मेरी शिराओं में औ...

प्रेम हमारा त्रिक अणुओं सा

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प्रेम हमारा त्रिक-अणुओं सा क्यूँ है?- *************************** तुम्हें तब भी प्रेम किया जब तुमसे रुष्ट था। जब तुमसे रुष्ट था, उस पल भी तुमसे प्रेम किया। ये प्रेम हमारा त्रिक अणुओं सा क्यूँ है? आकर्षण में प्रतिकर्षण, प्रतिकर्षण में भी आकर्षण जितना तुमसे विरह में तपा समीप आया उतना ही तुम्हारे जितना तुम्हारे समीप आया उतना ही संकोच ने सिकोड़कर दूर किया ये प्रेम हमारा भौतिकी के नियमों सा क्यूँ है? इतिसिद्धम होकर भी सिद्ध नहीं जितना ही तपता हूँ, उतना ही शीतल होता हूँ एक संतोष के तोष से जितना ही शीतल होता हूँ, उतना ही एण्ट्रॉपी मुझे आकुल कर देती है तुम्हारे प्रेम की! ये प्रेम हमारा ऊष्मागतिकी के नियमों सा क्यूँ है? तपता हूँ शीतल होने के लिए, शीतल होता हूँ विरह में तपने के लिए ये प्रेम हमारा कभी रुद्धोष्म  तो कभी समतापी सा क्यों है कभी केवल प्रेम पाने की एषणा कभी जितना मिले उससे अधिक देने की चाहना ये प्रेम हमारा भौतिकी के नियमों सा क्यूँ है? क्यूँ है ये प्रेम निश्चित होकर भी इतना अनिश्चित? ✍️ देव चित्र साभार बिस्वाल भैया की भित्ति से

सनातन का क्या होगा?

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देव-धरा संवाद-१ ************** "देव! ए देव!" "हाँ! कहो धरा! क्या बात है?"  जैसे स्वयं मनु-सतरूपा प्रलय की जलराशि को निहारते हुए बैठे हों, देव और धरा भादों में उफनती जाह्नवी के तट पर बैठे थे। धरा ने देव से प्रश्न पूछने के भाव से उसे पुकारा, क्यूंकि देव तो सदैव की भाँति कहीं शून्य में खोया, स्वयं को भूला बैठा था। जबकि स्वयं प्रकृति उसके पार्श्व में, नयनों में उसके लिए अजस्र प्रेम की सरि लिए उसे निहार रही थी। धरा के रूप में! "देव!...हमारा क्या होगा?" "अर्थात?  कैसा हमारा क्या होगा?" " अरे बुद्धू! हमारा से तात्पर्य है, हम सनातन के पथिकों का! देख ही रहे हो सर्वत्र अब्राहमिक पन्थों के अनुयायी सनातनियों को कभी दीमक की तरह झारखण्ड, तमिलनाडु में अंदर से निस्तेज करते जा रहे हैं, तो कहीं केरल व पश्चिम बंगाल में अपने अन्य रूप में वधिक बनकर नष्ट करते जा रहे हैं!"  देव के अधरों पर स्मित हास्य उभर आया। ये विचार उसे स्वयं के प्रेम पर गर्वान्वित कर रहा था कि इस प्रिय-प्रेयसी के मिलाप में भी धरा को देश, धर्म की चिन्ता है। उसने अपने चिरपरिचित स्मित हास्य ...

पीड़ा कश्मीर की!

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सभ्यता का सूरज था उपजा, वेद ऋचाएँ रची गयीं ये पूण्य धरा थी शारदा की, यहाँ मनुजता छली गयी सेब चिनार देवदारु के, वृक्षों पर खूनों के छीटे हैं इस भव्य भासती झेलम के, तलहटी में माँओं के बेटे हैं इन सड़कों पर न जाने, कितनी गिरजा लूटी गयीं बलात्कार के अंत मे उनकी, देह से अतड़ियाँ नोची गयीं इन घर की पत्थर दीवारों पे, कलाश्निकोव की चोटे हैं जिसको मानते पितृ-सम्पदा, उसमें कितनी खोटे हैं तुम्हारे पाक पिता पुरखों ने, कितनी जानें ले लीं थीं वो अबोध बाल-बालायें, उनके अंक में खेली थीं तुम जो कहते सहिष्णुता हो, मन में घिन्न सी आती है उन वीभत्स यादों में खोकर, शिर की शिरा तन जाती है आज षष्टदश वर्षों में, थी जलती चिता जो बुझ गयी है उन कातर बालाओं की , चीखों को शान्ति जो मिल गयी है पर फिरसे तुम ये अन्देशा, अपने दिलों में पाल न लो ये जन्नत न होगी काफ़िर की, ऐसा तुम फिर मान न लो ये द्विसहस्रनवदश वर्ष है, बीती सदी की बात गयी इस सनातन की सुप्त वो ज्वाला, फिर से हिय में जाग गयी इस सहस्र रवि सी ज्वाला को, पुनः न बुझने देंगे हम जो पुनः उठे कभी अरि-नयन, तो नयन दग्ध कर देंगे हम ©देव #कश्मीर_एक_टीसती_पीड़ा ...

राष्ट्रप्रेम

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यदि तुम्हारे शब्दों से राष्ट्रप्रेम का घोष न हो यदि तुम्हारी कलम कृपाण बन राष्ट्रहित में सज्ज न हो तो ये तुम्हारी लेखनी भारत! निरर्थक है! निरर्थक है!! यदि तुम्हारी जिह्वा से पुरखों का यशगान न हो यदि तुम्हारे उर में उनके बलिदानों का मान न हो तो ये तुम्हारा जीवन भारत! निरर्थक है! निरर्थक है!! ✍️देव चित्र गूूूगल से साभार

प्रपितामह व नात का सम्बंध!

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प्रपितामह व नात का सम्बन्ध जैसे सूद पर सूद का प्रबन्ध एक लगाव अनकहा, एक प्रेम हँसता हुआ एक आस भविष्य की अपने स्व के निकष की जैसे वट की लटकती जटाएँ जटाओं का वृक्ष बनना स्वयं से सिंचित स्वयं का अस्तित्व होना प्रपितामह व नात का सम्बन्ध जैसे हिम का नद बनना टकटकी बाँधे आँखों में जैसे स्व का खोना हर हठ को पूरा करना शक्य न हो, तो भी  नन्हे पैरों से स्व का चलना नात में स्व को निरखना एक प्रपितामह व नात का सम्बंध जैसे बूढ़े पंखों का फिरसे जगना अनंत से अँधियारे में जैसे सूर्य का उगना चुप हो गए होठों का जैसे फिरसे हँसना धीमे होते स्पन्दों का जैसे फिर से धड़कना जैसे एक अन्धा कुंआ और गिरते जाना एक डोर का सम्बल और सम्भलते जाना प्रपितामह व नात का सम्बंध आंखों में अनथक निरखना एक आस का जगना जो कभी न होगा उस भविष्य को निरखना भूत में हो यदि  भविष्य का देखना तो देखो हे सृष्टि! प्रपितामह व नात का होना। ✍️देव

मेरी परछाईं तू!

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मेरी परछाईं तू, एक तेरे आने से  अस्तित्व मेरा सम्पूर्ण पल-पल भटकते मानस को मिली एक ठाँव विश्रान्ति की मिला मुझे तेरे आने से मेरे होने का भान प्रथम  एक तू है जहाँ सम्पूर्ण हूँ हर उस पल, जिस पल तू अंक में मेरी  खेलता, करता बालपन एक तू है तो भान है देव हूँ मैं एक तेरे आने से पहले लगा था दैन्य हूँ मैं। जो तू है तो मैं हूँ परछाईं से ही तो भान है, देह का जो तू है तो मैं हूँ। ऐ मेरी परछाई! ©देव

चंद्र कई बलिदान हुए

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"बहुत निशाएँ बीती अबतक गोचर बहु दिनमान हुए एक बात तुम्हारी सुने हुए चंद्र कई बलिदान हुए" देख संदेशा सन्देश मंजूषा हिय ने हर्ष मनाया है हे प्रिय! हाँ प्रिय! कहो कछु बेकल मन हर्षाया है राग बसंती तान छेड़ दी उर-स्पंद के तार हिले अलंकार सी स्वरांजलि में तुम्हें सर्वस्व लुटाया है जग की रीत समझ रहे हैं तुम्हीं ने बन्ध लगाया है धुक धुक धौकती श्वासों ने विरह-अगन बढ़ाया है कहा नहीं, न कहूँ कभी वारि-सरि जो बहा चुका रीत गए हैं कुण्ड दृगों के उलीच के जल बरसाया है स्मित सी जो लोचन में है अर्थ नहीं सुख में दिन बीते देख सकूँ भर आँख तुम्हे मैं इस नयन ने नाप बढ़ाया है स्पर्श तुम्हारे पोरों का अबतक शेष रहा हाथ पर संकुचित तबसे पड़े बेचारे अब जाके जीवन पाया है अधर मेरे थे सूखे सूखे परित्यक्त कहीं पे पड़े थे ये फिर से जागी स्मृतियों ने इनपर रस बरसाया है जान रहा मृगमरीचिका है फिर भी दौड़ रहा है मन देख तुम्हारी परछाईं को पगला! अब बौराया है ✍️देव (चित्र साभार बिस्वाल भैया की वाल से)

तुम नहीं जानते!

तुम नहीं जानते ●●●●●●●●● तुम नहीं जानते  विपदा का रूप है क्या? विष भी मीठा होता है, है होती कड़वी औषध  तुम नहीं जानते विपदा की चाल है क्या? है घर्म धूप की क्षिप्र गति और शीत-गति है मन्द तुम नहीं जानते  विपदा कैसी है? प्रिया तो रमणीय होती है होती है रमणीय विषकन्या भी तुम नहीं जानते विपदा आती है कब? है जन्म भी होता सद्य सदा मृत्यु भी आगन्तुक होती है तुम नहीं जानते विपदा आयेगी कहाँ? जन्म वाहन में भी होता है होती है मृत्यु बिछौने पर तुम नहीं जानते! ✍️देव

तुम नहीं जानते प्रेम क्या है!

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तुम नहीं जानते प्रेम क्या है! अधरों के चुम्बन को,  शृङ्गो के मर्दन को यदि प्रेम कहते हो! तो नहीं जानते प्रेम क्या है! अधरों में रस जिससे है ये शृङ्ग उन्मत्त किससे है? यदि जानते हो! तो जान लोगे प्रेम क्या है! दो देहों के मिलने को, पाटलद्वय विहँसने को, यदि प्रेम कहते हो! तो नहीं जानते प्रेम क्या है! देह ढूँढ रहे जिसे पाटल श्रांत करे किसे? यदि जानते हो! तो जान लोगे प्रेम क्या है! सात जन्मों का है सम्बन्ध या तो इस जन्म का बन्ध यदि इसे प्रेम कहते हो! तो नहीं जानते प्रेम क्या है! प्रेम है इस पल में होना हम होकर मैं को खोना यदि जानते हो! तो जान लोगे प्रेम क्या है! ✍️देव चित्र साभार गूूूगल से (बिसवाल भैया)

सती-विरह

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सती-विरह ********* विरह दाह से दग्ध हुआ है मेरे अन्तस् का नीर सलिल त्याग मुझे क्यों चली गयी शून्य हुआ ये अनन्त नील वो मणि-मुक्तक जो टाँके थे इस गगन में हमने तुमने जो विदीर्ण हो गए बिछड़ के तुमसे कृष्ण-विवर से लगते वो सती तुम्हीं से रसमय था वृहद सृष्टि का सृजन अनूप तुमबिन चुभती कलियाँ हैं दग्ध कर रही धरा-धूप तुम बिन रक्त की सरि हहरती नयनों में नीर सलिल नहीं हृदय में उठती ज्वाला है नित मन को अब संतोष नहीं फुफकार रही अमर्ष की अग्नि जग को राख करूँ इस पल जिसने तुमसे विलग किया वो देख सके न आगत कल दोष रहा था मेरा क्या कुछ वैरागी था अनन्त काल से बैठ हिमालय विरक्त भाव  कुछ भी आस नहीं काल से ना ही प्रतीक्षा प्रेम की ही ना ही किसी से मोह किया ना ही रोष पाला था हिय में ना ही किसी से नेह किया जग के हित में जुड़ा था तुमसे नारायण ने दिया था बन्धन त्रिपुरासुर का अंत है करना धरा त्रास से करे है क्रन्दन जैसे जैसे समय था बिता तुमसे हिय ने प्रेम किया छुड़ा के शृंग शीतालय का  निर्मोही को था मोह लिया परन्तु काल ने खेला है कालजयी से खेल ये कैसा शिव को शव तुम बना गयी ये निलय लगे है मरघट जैसा समझाया था, ...

हाँ मैं हिन्दू हूँ!

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हाँ मैं हिन्दू हूँ- ********** खजुराहो के मंदिर सा टूटा पड़ा हूँ हम्पी के अवशेषों सा लुटा पड़ा हूँ वो गौरव, अभिमान, वो तुंग शिखर हाँ मैं हिन्दू हूँ, भूमि पे गिरा पड़ा हूँ मैं काशी का विश्वनाथ, ज्ञान का देवता हूँ ज्ञानवापी के अँधियारे में घुटा पड़ा हूँ लेके कोई विप्र मुझे कुँए में शेष पड़ा है हाँ मैं हिन्दू हूँ, सदियों तक क्लेश सहा है मैं विद्या की देवी सा भग्न खड़ा हूँ शारदा के मठ का वो बुझा दिया हूँ ओंकार की ध्वनि अजानों में जो उलझी हाँ मैं हिन्दू हूँ, घाटी में मौन खड़ा हूँ रघुनंदन के चरणों में जो पुष्प चढ़ा था कोदण्ड कराल का शर बनके जो युद्ध लड़ा था जिसने म्लेच्छ की महिमा का है ध्वंश किया हाँ मैं हिन्दू हूँ, आज मैं षण्ढ पड़ा हूँ जिसने पाण्डव संग कौरवी युद्ध लड़ा जिसका पा आशीष धनंजय बाण बढ़ा जिसने यमुना-नीर को विषहीन किया हाँ मैं हिन्दू हूँ, उस कान्हे को भूल गया हूँ हिंगलाज में बनके ज्योति जलता था जो गर्देश-विनायक पे गर्वित हो नमता था जो जिसने कासिम, गोरी की शमशीरें झेलीं हाँ मैं हिन्दू हूँ, आज मैं पस्त पड़ा हूँ परन्तु, परन्तु भान रहे ये तुमको, मैं बप्पा रावल जिसने चाँद सितारे को किया था घायल अरब ...

प्रेम! समझते हो?

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प्रेम जानते हो? प्रेम को समझते हो? ●●●●●●●●●●●●●●●●●●● तुम कहते हो, प्रेम को समझते हो! प्रेम को? युग बीत गए परिभाषा गढ़ने में साज समय के टूट गए इसे समझने में और, और तुम कहते हो तुम प्रेम समझते हो! दम्भ का मर्दन हुआ दर्प का दलन हुआ प्रेम न समझ पाया और तुम कहते हो प्रेम को समझते हो! कृष्ण ने कभी कुंजों में राघव ने कभी रण में इसे परिभाषा दी किसी ने इसे तजा किसी ने इसीके लिए रण था रचा दो विपरीत ध्रुवों से जिसे नारायण  समझा न सके और,  और तुम कहते हो तुम प्रेम समझते हो? शिव ने बिछुड़ कर जिससे जग को तजा जिसके लिए धूर्जटी ने नंदनवन रचा दो अतियों में होकर भी जो प्रेम को न समझा सका और तुम कहते हो तुम प्रेम को समझते हो! भव से जो पार उतारतीं हैं जो शव से जड़ को, चेतन शिव बनाती हैं उन्हें भी दो जन्म लेने पड़े अग्नि के दाह भी सहने पड़े और तुम कहते हो, कि प्रेम को समझते हो जग समझे इस हेतु परा-प्रकृति को तजा जग समझे इस हेतु परमा-प्रकृति को चुना कभी सहस्रों के  रसधार बने कभी मीरा के गिरधर-गोपाल बने फिरभी न समझ सके जो और, और तुम कहते हो तुम प्रेम समझते हो? सरि का पयोधि से  मिलना है प्रेम त...

मन को समझाऊँ कौन विधि

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मन को समझाऊँ कौन विधि ●●●●●●●●●●●●●●●● यदि पथ के अँधियारे से,  पथिक तुझे डर लगता है तो अंतर के दीपक में  साहस का तू स्नेहन भर लगा मनोबल की बाती आत्मतेज की ज्योत जला अँधियारा न रहना है,  न रहा कभी चिरंतन है धैर्य की लाठी हाथ में ले,  चैतन्य हो तु आगे बढ़ अनेक भ्रमों के सांप छछूंदर,  इनको तू अब दूर भगा एक बार गिरे तो उठ जा फिर,  फिरसे अपनी दौड़ लगा जो पड़ा रहा और उठा नहीं तो जग में कौन सहारा है जो गिर गिर के भी रहे दौड़ते लभ्य उन्हें जग सारा है वीरों की है थाती तू धिरों का है अंश बड़ा जिनने जग को जीता है उनका है तू रक्त सगा नाम न उनका धूमिल कर दृढ़ हो अब तू अलख जगा लाख बवण्डर, दावानल हो कौन अमर्त्य को रोक सका हुँकार अहं ब्रह्मास्मि का  मस्तक को तू ऊँचा कर घुस जा कान्तर में डटके आगे है तेरा लक्ष्य खड़ा बोल भवानी, हर हर कर शिरा में शोणित रक्त बहा बाँध माथ पे भगवा पग अरि से अब तू आंख लड़ा रुक ना अब तू मध्यधार आगे है तेरा स्वर्ग पड़ा अवसान सूर्य का भ्रम है एक पुनः जो उसको आना है तेरे अंतर में उसको  ज्योत जो एक जलाना है ये भूमि तुझको बुला रही इसका कर्ज चुकाना है ...

तुम्हीं हो जो मुझे देव बनाता है!

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तुम्हीं हो जो मुझे देव बनाता है- ●●●●●●●●●●●●●●●●● तुम्हारा ये एकटक देखना मेरे टूटे हुए क्षणों में भटकने नहीं देता तुम्हारे ये निश्छल नयन मुझे मार्ग दिखाते हैं करते हैं ढेरों बातें कुछ भी न कहके और सबकुछ कह जाते हैं धो देते हैं कलुष मेरे उर के कोनों से बन पावनी की धारा सब धवल कर जाते हैं तुम्हारा ये बाट जोहना मुझे घर वापस लाता है इस चौराहे से जीवन में सही है क्या? मुझे बताता है मेरे पैरों से लिपटना तुम्हारा और लिपट के पुकारना मेरे थके से पैरों को संजीवनी दे जाता है तुम्हारा मेरे साथ निर्द्वंद, आश्वस्त सा रहना मुझे प्रेरणा देता है कि और सशक्त बनना है मुझे जब तुम सहलाते हो किसी कीट, किसी पशु को सुरक्षा का उसे देते हो आश्वासन तब-तब मैं परिवर्तित होता हूँ बन जाता हूँ एक विश्वमानव जिसे पोषित करना है संरक्षित रखना है प्रकृति के हर अंश को हाँ मेरे हृदय के टुकड़े! हाँ मेरे आत्मा की अभिव्यक्ति! तुम्हीं हो, जो मुझे देव बनाता है! ✍️ देव

प्रियतमा

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प्रिय-रंजनी मन-मंजनी सुवदन तुम्हारा मन मोहे देख तुम्हारे चितवन को हिय भूल सुधि सुधबुध खोये कमलपुष्प पे भ्रमर की भाँति चित्त अनुरक्त है रूप तुम्हारे लास्य भाव, चंचल-चितवन, बहुविध-भङ्ग हैं नयन सखारे व्यालप्रिया से केश सज्ज, गजगामिनी, मदमत्त नयन क्षीणकटि, उन्नत-वक्ष, ज्यों गिरिवर-शृंग उत्थित-मगन मदिरा-कुल से सिक्त वायु सी, विकीर्ण हो रही गन्धउर्मियाँ  संग तुम्हारा मधुशाला सा, मद्यप से विस्मृत विधि की निधियाँ ©देव (चित्र गूगल से साभार)

क्यों नहीं बरसते दृग मेरे

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क्या उत्तर दूँ तुम्हे क्यों नहीं बरसते दृग मेरे? कैसे बताऊँ तुम्हारे विछोह से विदीर्ण हृदय की करकन से उपजी टीस! तुम्हारी स्मृतियों के तीक्ष्ण कोनों से क्षत-विक्षत मेरे हृदय की पीड़ा! द्रवित हो दृगों के सोतों से कैसे अहर्निश रक्तसरि सी बहती थी कैसे हर तटबंध टूटे थे कैसे मेरा अस्तित्व आप्लावित हो जलमग्न हुआ पड़ा था तुम्हारी स्मृतियों के द्रुतप्रवाह में परन्तु कबतक?  कबतक हहरती वह वाजिनी! सरि के उद्गम को, उस पीड़ा के हिमनद को कभी तो सुखना ही था और शेष छोड़ जाना था  एक अमिट, अतल गहराई से खोह को जहाँ कभी तुम्हारे संग बिते पलों की  अमृतधारा बहती थी जहाँ कभी विछोह के ज्वार से उफनती रक्तसरि हहरती थी कबतक? कहीं सुदूर हृदय-हिमालय के किसी कोने में  उस घनीभूत पीड़ा का हिम  अब भी चिटकता है,  अल्प ही सही  द्रवित होता है जब जब इस एकाकीपन के मरुस्थल से चलती विरह-अग्नि की लपट से तप्त स्मृतियों की वायु उसे थपेडती है और पुनः फूट पडती है  उस रक्त-सरि की धारा पुनः उपस्थित होता है प्रलय दृश्य धराशायी हो जाता है हर जतन का दुर्ग और शेष रह जाता है  तुम्हारे स्मृतियों से ह...

मन की व्यथा

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तज दे निज मन की व्यथा उसको अब तू ढील दे है विकट रीत जग की बड़ी पीड़ित हृदय को पीर दे ये निढाल सी तन की गठरी ये मलिन सा मुख तेरा तेरे हृदय की वेदना के गीत गायें सुन जरा तू बहुत ही रो लिया अब मन को तू धीरज धरा जिसकी पूजा में पड़ा था वो किसी का हो लिया दुःख भी अब थक से गये संग तेरे जो चल रहे अब तो अपने साथ से इनको मन तू तज जरा! था कहाँ का है कहाँ किस दिशा आगे बढ़ा जब उगी थी लालिमा तू कहीं अनमुख खड़ा तेरे हाथों की रेखायें है तेरे ही कर्म से क्यों अभी तक भाग्यबद्ध? कर्म पथ तू चल जरा! ©देव (चित्र गूगल से साभार)