मन की व्यथा


तज दे निज मन की व्यथा
उसको अब तू ढील दे
है विकट रीत जग की बड़ी
पीड़ित हृदय को पीर दे

ये निढाल सी तन की गठरी
ये मलिन सा मुख तेरा
तेरे हृदय की वेदना के
गीत गायें सुन जरा

तू बहुत ही रो लिया अब
मन को तू धीरज धरा
जिसकी पूजा में पड़ा था
वो किसी का हो लिया

दुःख भी अब थक से गये
संग तेरे जो चल रहे
अब तो अपने साथ से
इनको मन तू तज जरा!

था कहाँ का है कहाँ
किस दिशा आगे बढ़ा
जब उगी थी लालिमा
तू कहीं अनमुख खड़ा

तेरे हाथों की रेखायें
है तेरे ही कर्म से
क्यों अभी तक भाग्यबद्ध?
कर्म पथ तू चल जरा!

©देव

(चित्र गूगल से साभार)

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