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चंद्र कई बलिदान हुए

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"बहुत निशाएँ बीती अबतक गोचर बहु दिनमान हुए एक बात तुम्हारी सुने हुए चंद्र कई बलिदान हुए" देख संदेशा सन्देश मंजूषा हिय ने हर्ष मनाया है हे प्रिय! हाँ प्रिय! कहो कछु बेकल मन हर्षाया है राग बसंती तान छेड़ दी उर-स्पंद के तार हिले अलंकार सी स्वरांजलि में तुम्हें सर्वस्व लुटाया है जग की रीत समझ रहे हैं तुम्हीं ने बन्ध लगाया है धुक धुक धौकती श्वासों ने विरह-अगन बढ़ाया है कहा नहीं, न कहूँ कभी वारि-सरि जो बहा चुका रीत गए हैं कुण्ड दृगों के उलीच के जल बरसाया है स्मित सी जो लोचन में है अर्थ नहीं सुख में दिन बीते देख सकूँ भर आँख तुम्हे मैं इस नयन ने नाप बढ़ाया है स्पर्श तुम्हारे पोरों का अबतक शेष रहा हाथ पर संकुचित तबसे पड़े बेचारे अब जाके जीवन पाया है अधर मेरे थे सूखे सूखे परित्यक्त कहीं पे पड़े थे ये फिर से जागी स्मृतियों ने इनपर रस बरसाया है जान रहा मृगमरीचिका है फिर भी दौड़ रहा है मन देख तुम्हारी परछाईं को पगला! अब बौराया है ✍️देव (चित्र साभार बिस्वाल भैया की वाल से)