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द्रोण भी मैं बन जाऊँगा!

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हे पुत्र तुम्हारे प्रेम-बद्ध, द्रोण भी मैं बन जाऊँगा गोधूम चूर्ण न बने भाग्य! चाकर भी बन जाऊँगा हो जिसे समझना जो कुछ भी, मुझे चिंतना तेरी है बने मनुज तू, धर्म जिये, पावन संस्कार दिलाऊँगा कर्म पथ तू बढ़े पुण्य के, नित नए प्रतिमान गढ़े परन्तु अहित जो तेरा हो, मैं रण विकट रचाऊँगा तू मान धरे कुल वसिष्ठ का, नित नए प्रतिमान गढ़े तेरे चरित्र को उज्ज्वल करने, प्रतिमान स्वयं बन जाऊँगा माधव सा हो पुत्र मेरा, ले आस तुम्हें मैं पोष रहा जो आतप-वर्षा-शीत सताये, शेषनाग बन जाऊँगा त्यागी हूँ मैं, लोभ परे, धन, यश की ना इच्छा है परन्तु तेरे पालन के हित, जीत स्वर्ग भी लाऊँगा कभी तुम्हारे दादा ने मुझे लिए जो स्वप्न गढ़े वही स्वप्न मैं पुत्र मेरे! थाती में दे जाऊँगा ©तुम्हारा पिता

अब तुम कम याद आते हो!

अब तुम कम याद आते हो, किसी नदी के रेत के टीले से, जिसपर कभी बैठते थे हम जिसपे कभी पड़े थे निशान! साथ-साथ तेरे मेरे कदमों के हाँ, अब तुम कम याद आते हो वह बहकती हवा का चलना, तेरे आने का अंदेशा वह सीढ़ियों की खटपट, और तेरे आने का संदेशा सही कहा! अब तुम कम याद आते हो घिर के जो आये बादल, वो पानी की बूँदें वो तेज बरसाती झोंका, और तेरी चितवन सही कहा! अब तुम कम याद आते हो तुम्हारी तस्वीर को अबतक दीमक ना लगने दिया किसी मोरपंख सा सजा के रखा है उन्हें बटुए के तहखाने में हाँ! सही कहा! अब तुम कम याद आते हो दुनिया ने झिंझोड़ा है भीतर तक मुझे,  तिनका तिनका सा हो गया हूँ फिर भी सँजो के रखा है सीने में तुझे, सहेज कर हाँ! सही कहा! अब तुम कम याद आते हो क्योंकि याद आने के लिए भूलना है जरूरी साँसों के साथ चलते हो तुम धड़कन के संग धड़कते हो तुम तुम्हें भूला ही कब, कि याद करूँ हाँ! सही ही कहा! अब तुम कम याद आते हो! अब तुम कम याद आते हो! ©देव

पता है तुम्हें?

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पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम क्या है? क्या है किसीके प्रेम में होना? पर जानता हूँ इतना कि, जब तुम्हारे कुंतल से छनकर आती धूप मेरे मुख पर पड़ती है तो, सादियों से जमी मेरे हृदय की परत पिघलने लगती है, और मुझे आभास कराती है मेरे जीवित होने का पता है तुम्हें! जब गर्म दोपहरी में यही केश मेरे मुख पर पड़ती धूप को अपनी छाया से हर लेते हैं तो, हर लेते हैं जीवन के संघर्षों से उपजी तपन को, शीतल कर देते हैं मेरे हृदय के ताप को, संतोष के सुख से भर देते हैं, जिसे जाना न था कभी पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम क्या है? पर जब तुम मेरे हाथों को अपने कोमल हाथों में लेती हो, रोम रोम हर्षित हो जाते हैं मेरे, जो मृत ही पड़े थे सदैव से तुम्हारे हाथों की रेखाओं में दिखता है भाग्य मेरा, प्रकाश से भरा हुआ, जिसमें था केवल अँधियारा पसरा हुआ पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम में होना क्या है? पर, जब तुम आती हो एक साँस सी आती है साथ तुम्हारे, नहीं तो एक शव ही तो था तुम्हारे आने से पहले, एक चलता फिरता, भावहीन मुख वाला शव परन्तु आज आनन्द से नाचता है अस्तित्व मेरा, जीवन है मेरे कोशों में, मेरी शिराओं में औ...