प्रेम-द्यूत
#प्रेम_द्यूत प्रेम में जीता कौन है अबतक, सबकी अबतक हार हुई मीठा मीठा सबकी आशा, आस ये सबकी खार हुई द्यूत विकट है प्रेम ये बन्धु! पासा सदा एक ही लाये कितना भी तुम मन से खेलो, कैसे जीत भला हो पाये हँसने की देखो कोशिश करते, रोते रोते जी जाते हैं लोग यहाँ पर अमिय ढूँढते, तड़प के देखो मर जाते हैं मत कर पगले आस कस्तूरी, वन-वन भटक के रोयेगा उसके आस में जीवन खोके, निज को भी तू खोयेगा जिसकी पीड़ा भय की जाया, जिसके आँखों भय के आँसू प्रेम के अश्रू कैसे निकसे, थका मैं कहके छोड़ झिझक तू प्रेम पुनीत है, विरल है जग में, पावन हिय में बसता है लोभ तृषा के मोह में फँसके, मनुज अनाहक मरता है वासना के पंक में देखो, शूकर सा लोट लगाता है प्रेम का पावन पय निरख के, श्वान सा वह भग जाता है एक समय में दो दो बातें करता मैं पागल लगता हूँ परन्तु सत्य ये विचित्र है बन्धु, प्रेम किसीसे करता हूँ मनुज हृदय है, सदा सशंकित, प्रेम पकड़ के रोता है छोड़ गया था कभी जो तजके, उसीकी माला जपता है प्रेम में कैसी करें शिकायत, प्रिय की मूरत ईश यहाँ पर उसीकी धुन में बन बैरागी, भटके जग में यहाँ-वहाँ पर ©काफ़िर