सनातन का क्या होगा?
देव-धरा संवाद-१ ************** "देव! ए देव!" "हाँ! कहो धरा! क्या बात है?" जैसे स्वयं मनु-सतरूपा प्रलय की जलराशि को निहारते हुए बैठे हों, देव और धरा भादों में उफनती जाह्नवी के तट पर बैठे थे। धरा ने देव से प्रश्न पूछने के भाव से उसे पुकारा, क्यूंकि देव तो सदैव की भाँति कहीं शून्य में खोया, स्वयं को भूला बैठा था। जबकि स्वयं प्रकृति उसके पार्श्व में, नयनों में उसके लिए अजस्र प्रेम की सरि लिए उसे निहार रही थी। धरा के रूप में! "देव!...हमारा क्या होगा?" "अर्थात? कैसा हमारा क्या होगा?" " अरे बुद्धू! हमारा से तात्पर्य है, हम सनातन के पथिकों का! देख ही रहे हो सर्वत्र अब्राहमिक पन्थों के अनुयायी सनातनियों को कभी दीमक की तरह झारखण्ड, तमिलनाडु में अंदर से निस्तेज करते जा रहे हैं, तो कहीं केरल व पश्चिम बंगाल में अपने अन्य रूप में वधिक बनकर नष्ट करते जा रहे हैं!" देव के अधरों पर स्मित हास्य उभर आया। ये विचार उसे स्वयं के प्रेम पर गर्वान्वित कर रहा था कि इस प्रिय-प्रेयसी के मिलाप में भी धरा को देश, धर्म की चिन्ता है। उसने अपने चिरपरिचित स्मित हास्य ...