सनातन का क्या होगा?

देव-धरा संवाद-१
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"देव! ए देव!"
"हाँ! कहो धरा! क्या बात है?"
 जैसे स्वयं मनु-सतरूपा प्रलय की जलराशि को निहारते हुए बैठे हों, देव और धरा भादों में उफनती जाह्नवी के तट पर बैठे थे। धरा ने देव से प्रश्न पूछने के भाव से उसे पुकारा, क्यूंकि देव तो सदैव की भाँति कहीं शून्य में खोया, स्वयं को भूला बैठा था। जबकि स्वयं प्रकृति उसके पार्श्व में, नयनों में उसके लिए अजस्र प्रेम की सरि लिए उसे निहार रही थी। धरा के रूप में!

"देव!...हमारा क्या होगा?"
"अर्थात?  कैसा हमारा क्या होगा?"
" अरे बुद्धू! हमारा से तात्पर्य है, हम सनातन के पथिकों का! देख ही रहे हो सर्वत्र अब्राहमिक पन्थों के अनुयायी सनातनियों को कभी दीमक की तरह झारखण्ड, तमिलनाडु में अंदर से निस्तेज करते जा रहे हैं, तो कहीं केरल व पश्चिम बंगाल में अपने अन्य रूप में वधिक बनकर नष्ट करते जा रहे हैं!"

 देव के अधरों पर स्मित हास्य उभर आया। ये विचार उसे स्वयं के प्रेम पर गर्वान्वित कर रहा था कि इस प्रिय-प्रेयसी के मिलाप में भी धरा को देश, धर्म की चिन्ता है। उसने अपने चिरपरिचित स्मित हास्य के साथ कहना प्रारम्भ किया!

"धरा! ग्रामीण जीवन के हमारे बालपन के दिन स्मरण हैं?"
" अल्प ही देव! जानते ही हो! नगरक्षेत्र में ही मेरा लालनपालन हुआ है।"
"चलो कोई नहीं, मैं बताता हूँ!
  जब हम बालक थे, तो हमारे गाँव में बिजली नहीं थी।
जब साँझ होने को होती थी व सूर्यदेव पश्चिम में अस्त होने को होते थे, तो कुछ ही जन दीपक जलाने की व्यवस्था करते थे! कुछ जला लेते थे! अन्य बैठे ही रहते थे, जबतक कि साँझ के बाद अँधियारा न घेर ले। तब उन्हें ध्यान आता था कि दीप जलाने में विलम्ब हो गया! अब शीघ्र जलाना चाहिए। उसी प्रक्रम में कई बार अँधियारे में वे स्वयं को चोटिल कर लेते थे, तो कभी कोई मूल्यवान वस्तु उनके ठोकर से टूट जाती थी।"
" हाँ! हाँ! स्मरण है! मुझसे भी एक बार नानी के घर पर घी का डिब्बा गिरकर फट गया था। बहुत डाँट पड़ी थी।"
इतना कहते हुए धरा बालसुलभ हँस पड़ी, उसकी निष्कलंक मोतियों सी दंतावली, उसके पाटल अधरों की कमनीयता ने एक पल को देव को अपने विषय से भटका दिया! परन्तु पुनः संयत होकर देव ने आगे कहा।

" हाँ! वैसे ही! ये तीसरे प्रकार के लोग! ऐसे ही हैं वर्तमान के बहुधा सनातन के पथिक! अभी तो सनातन की साँझबेला होने को ही है धरा! कुछ उँगलियों पर गिन सको ऐसे श्रेष्ठजन हैं  जिन्होंने मशालें जला ली हैं! प्राणपण से लगे हुए हैं कि अँधियारा न होने पाये। 
  दूसरे वे हैं, जिन्हें अब भान होने लगा है कि अँधियारा आसन्न है। उन्होंने तैयारी प्रारम्भ कर दी है।
 तीसरे तो वे हैं, जो बहुल हैं। बहुधा हमारे आस-पास देखने को मिलते हैं! ये वे हैं, जो घुप्प अँधियारे होने पर ही समझेंगे या नष्ट हो जायेंगें। 
 परन्तु ध्यान रहे धरा! जैसे कभी भी  सर्वत्र अँधियारा नहीं होता, अँधियारा सर्वत्र राज नहीं कर सकता।
 ठीक उसी प्रकार सनातन भी कभी पूर्ण अँधियारे में अवसान का भागी नहीं बनेगा। परन्तु ये सम्भव है, कि सनातन अँधियारा देखेगा अवश्य।
 प्रत्येक सभ्यता को कभी न कभी अपना अवसान देखना पड़ता है। कभी सागरमाथा सा उठान, तो कभी गर्त सा पतन!
 परन्तु सूर्य पुनः उदय अवश्य होता है धरा!
 सनातन के प्रहरी तो भाग्यशाली हैं, कि महाकाल की कृपा से वे बन्धु जागरण की मशाल पहले ही जला रहे हैं! जला चुके हैं! अँधेरे के अभ्यस्तों को प्रकाश से परिचित करा रहे हैं! आगत अँधियारे के सङ्कट से परिचित करा रहे हैं!
 वे सनातन को कभी भी अस्त होने नहीं देंगे!"

" जैसे कि तुम देव!"
 इतना कहते हुए धरा ने देव के काँधे पर अपना शीश पूर्ण आश्वस्ति के साथ रख कर आँखें अस्त होते सूर्य पर टिका दीं। देव भी निशा की गोद में जाते सूर्यदेव को देख मुस्करा उठा।

✍️देव
चित्र गूगल से साभार

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