क्या बताऊँ तुम्हें

क्या बताऊँ तुम्हें-
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तुमसे कहूँ क्या धरा?
क्या बताऊँ तुम्हें?
मैंने देखी है अपनी ही मृत्यु
अपनी ही आंखों से
देखा है अपनी साँसों का
धीरे-धीरे कर रुक जाना

क्या बताऊँ तुम्हें कि
बन्द किया है अपनी खुली आँखों को
अपने उंगलियों के पोरों से
और देखा है आंखों में
जलते दिए का बुझ जाना

क्या बताऊँ तुम्हें धरा?
क्या बताऊँ तुम्हें कि
कैसे सुना है अपने ही कानों से
अपने दौड़ते धड़कनों का
धक्क से ठहर जाना?

क्या बताऊँ तुम्हें धरा?
क्या बताऊँ तुम्हें कि
कैसे तुम्हारी स्मृतियों का चित्रपट
चलते चलते ठहरा?
कैसे बताऊँ क्या था
उसका रुक जाना?

कितनी स्मृतियाँ!
कितने जन्मों की!
हर बार तुम्हारा होना
हर बार तुमसे बिछड़ जाना

क्या बताऊँ तुम्हें धरा?
कैसे बताऊँ तुम्हें, वह कथा
जिसमें चलता रहा
सहस्रों बार जन्मना
तुमसे मिलना
मिलके बिछड़ जाना!
क्या बताऊँ तुम्हें धरा?

©देव
चित्र गूूूगल से साभार

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