पीड़ा कश्मीर की!
सभ्यता का सूरज था उपजा, वेद ऋचाएँ रची गयीं ये पूण्य धरा थी शारदा की, यहाँ मनुजता छली गयी सेब चिनार देवदारु के, वृक्षों पर खूनों के छीटे हैं इस भव्य भासती झेलम के, तलहटी में माँओं के बेटे हैं इन सड़कों पर न जाने, कितनी गिरजा लूटी गयीं बलात्कार के अंत मे उनकी, देह से अतड़ियाँ नोची गयीं इन घर की पत्थर दीवारों पे, कलाश्निकोव की चोटे हैं जिसको मानते पितृ-सम्पदा, उसमें कितनी खोटे हैं तुम्हारे पाक पिता पुरखों ने, कितनी जानें ले लीं थीं वो अबोध बाल-बालायें, उनके अंक में खेली थीं तुम जो कहते सहिष्णुता हो, मन में घिन्न सी आती है उन वीभत्स यादों में खोकर, शिर की शिरा तन जाती है आज षष्टदश वर्षों में, थी जलती चिता जो बुझ गयी है उन कातर बालाओं की , चीखों को शान्ति जो मिल गयी है पर फिरसे तुम ये अन्देशा, अपने दिलों में पाल न लो ये जन्नत न होगी काफ़िर की, ऐसा तुम फिर मान न लो ये द्विसहस्रनवदश वर्ष है, बीती सदी की बात गयी इस सनातन की सुप्त वो ज्वाला, फिर से हिय में जाग गयी इस सहस्र रवि सी ज्वाला को, पुनः न बुझने देंगे हम जो पुनः उठे कभी अरि-नयन, तो नयन दग्ध कर देंगे हम ©देव #कश्मीर_एक_टीसती_पीड़ा ...