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Showing posts from August, 2021

कारिक-सुनन्दिनी -- गाथा जन्मों की - भाग-१

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#जन्मान्तर_भाग_१ कहते हैं ये कथा जिसने भी सुनाई, उसे ऐसे ही भाग्य से होकर गुजरना पड़ा है! आज काफ़िर ये कथा सुना रहा है, क्योंकि जो चिता से होकर गुजर चुका हो, उसे चिता से भय कैसा? जो सबकुछ खो चुका हो, उसे खोने का भय कैसा?  तो चलिए, सुनाते हैं वो कथा! जन्मान्तर- कथा जन्मों की- भाग-१ ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●  धू-धू कर जलती चिता से उठती लपटें, घनघोर वर्षा से भी शान्त नहीं हो रही थीं! जैसे लगता था कोई ऐसा लेटा है उस चिता में, जिसकी आत्मा की अगन शान्त ही नहीं होना चाहती, देह के शान्त हो जाने के पश्चात भी! उसी चिता के सम्मुख बैठा था एक मुण्डित मस्तक, गैरिक वस्त्रों में लिपटा, कहीं अपने में ही खोया एक सन्यासी सा दिखने वाला मनुज!   चिता की जलती लपटें वर्षा के झरते जल में भी स्पष्ट दिखते उसके झरते अश्रुओं से प्रतिबिम्बित होकर उसके गौरवर्ण मुख को एक अलग ही आभा दे रही थीं! यदि कोई सुन सकता तो सुनता उसके उन अधरों को कहते हुए... " हम अवश्य मिलेंगे नन्दिनी! महाकाल पशुपतिनाथ के चरणों में यदि एक पल को भी मेरी सच्ची श्रद्धा रही है! यदि उन्हें एक पल को भी निज प्राणों को अपूर्व श्रद्धा से अर्...

वीरक-वाणी - अंत

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श्रावण मास के पूर्णिमा का चाँद घने काले घहराते बादलों के बीच लुकाछिपी खेल रहा था। क्षणभर को दिखाई देता था, पुनः स्याह काले बादलों के पीछे चला जाता था! जैसे उसे शीघ्रता थी अंधेरे को चुन लेने की!   अपने घर के दूसरे तल की बालकनी में खड़ी वाणी चाँद के इस खेल को देखे जा रही थी!    " क्यों चले गए वीरक? क्यों? क्या एक पल भी अपनी वाणी का ध्यान नहीं आया?"  अभी स्टेशन पर घटी घटना को एक दिन ही हुए थे! वाणी के लिए विश्वास कर पाना भी कठिन था, असम्भव ही था कि वीरक नहीं रहा! कोई माध्यम भी तो नहीं था, कि ज्ञात हो कि हुआ क्या? कैसे हुआ? सबकुछ जो एक सपना लग रहा, क्या वह सत्य था? सब आँखों के सम्मुख ही तो हुआ था! शर्मा अंकल भी तो थे! " मुझे याद कर रही वाणी?" सहसा कानों में गूँजी वह आवाज, जिसे वाणी आजीवन सुबह-शाम सुनना चाहती थी! " वीरक?" " और कौन पगली?" वाणी ने मुड़कर रेलिंग के दाहिने छोर की ओर देखा तो सन्न रह गयी! हँसे कि रोये? खुश हो कि उलाहना दे? कुछ भी उसकी समझ में नहीं आ रहा था! सामने रेलिंग से पीठ टिकाये वह खड़ा था, जिसके सीने से लगकर एक-एक पल  बिताने का सोचा था व...