कारिक-सुनन्दिनी -- गाथा जन्मों की - भाग-१
#जन्मान्तर_भाग_१ कहते हैं ये कथा जिसने भी सुनाई, उसे ऐसे ही भाग्य से होकर गुजरना पड़ा है! आज काफ़िर ये कथा सुना रहा है, क्योंकि जो चिता से होकर गुजर चुका हो, उसे चिता से भय कैसा? जो सबकुछ खो चुका हो, उसे खोने का भय कैसा? तो चलिए, सुनाते हैं वो कथा! जन्मान्तर- कथा जन्मों की- भाग-१ ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●● धू-धू कर जलती चिता से उठती लपटें, घनघोर वर्षा से भी शान्त नहीं हो रही थीं! जैसे लगता था कोई ऐसा लेटा है उस चिता में, जिसकी आत्मा की अगन शान्त ही नहीं होना चाहती, देह के शान्त हो जाने के पश्चात भी! उसी चिता के सम्मुख बैठा था एक मुण्डित मस्तक, गैरिक वस्त्रों में लिपटा, कहीं अपने में ही खोया एक सन्यासी सा दिखने वाला मनुज! चिता की जलती लपटें वर्षा के झरते जल में भी स्पष्ट दिखते उसके झरते अश्रुओं से प्रतिबिम्बित होकर उसके गौरवर्ण मुख को एक अलग ही आभा दे रही थीं! यदि कोई सुन सकता तो सुनता उसके उन अधरों को कहते हुए... " हम अवश्य मिलेंगे नन्दिनी! महाकाल पशुपतिनाथ के चरणों में यदि एक पल को भी मेरी सच्ची श्रद्धा रही है! यदि उन्हें एक पल को भी निज प्राणों को अपूर्व श्रद्धा से अर्...