वीरक-वाणी - अंत
श्रावण मास के पूर्णिमा का चाँद घने काले घहराते बादलों के बीच लुकाछिपी खेल रहा था। क्षणभर को दिखाई देता था, पुनः स्याह काले बादलों के पीछे चला जाता था! जैसे उसे शीघ्रता थी अंधेरे को चुन लेने की!
अपने घर के दूसरे तल की बालकनी में खड़ी वाणी चाँद के इस खेल को देखे जा रही थी!
" क्यों चले गए वीरक? क्यों? क्या एक पल भी अपनी वाणी का ध्यान नहीं आया?"
अभी स्टेशन पर घटी घटना को एक दिन ही हुए थे! वाणी के लिए विश्वास कर पाना भी कठिन था, असम्भव ही था कि वीरक नहीं रहा! कोई माध्यम भी तो नहीं था, कि ज्ञात हो कि हुआ क्या? कैसे हुआ? सबकुछ जो एक सपना लग रहा, क्या वह सत्य था? सब आँखों के सम्मुख ही तो हुआ था! शर्मा अंकल भी तो थे!
" मुझे याद कर रही वाणी?"
सहसा कानों में गूँजी वह आवाज, जिसे वाणी आजीवन सुबह-शाम सुनना चाहती थी!
" वीरक?"
" और कौन पगली?"
वाणी ने मुड़कर रेलिंग के दाहिने छोर की ओर देखा तो सन्न रह गयी! हँसे कि रोये? खुश हो कि उलाहना दे? कुछ भी उसकी समझ में नहीं आ रहा था! सामने रेलिंग से पीठ टिकाये वह खड़ा था, जिसके सीने से लगकर एक-एक पल बिताने का सोचा था वाणी ने! वही लालिमा लिए काले बाल, जो कन्धे तक जाते थे, पर पीछे को अच्छे से व्यवस्थित थे! करीने से उगी दाढ़ी और वही हल्की सी ना दिखती हुई सी हँसी!
चाँद बादलों में छिपा था, पर वीरक तो जैसे चमक रहा था!
" स्मार्ट लग रहा हूँ ना?"
" हाँ?....."
हॉं कहते हुए भी जैसे वाणी पूछ रही थी कि क्या कहा? फिर से कहो।
" स्मार्ट लग रहा हूँ ना पगली? यही पूछ रहा!"
" क्यों चले गए मुझे छोड़कर वीरक? क्यों?"
"मैं कहाँ चला गया पगली? मैं तो देखो तुम्हारे पास ही हूँ!"
"तो....तो तुम सच में हो ना?"
"तो क्या भई! देखो! बात भी कर रही मुझसे। खुदको चिकोटी काटके देखो, स्वप्न नहीं है!"
" तो...तो तुम यहाँ कैसे? मतलब कैसे यहाँ तक पहुँचे? किसीने देखा नहीं ना तुम्हें?"
" वही डर!...अब भी डर रही वाणी?
ख़ैर! चिन्ता ना करो! मुझे तुम्हारे सिवा कोई नहीं देख सकता पगली!"
" मम् .....मतलब?"
" अब तुम्हारे इस वीरक का अस्तित्व बस तुम्हारे लिए है वाणी! कहा था ना, कि सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा! मेरा प्रेम देह के बाद भी तुम्हारे पास रहेगा, मैं रहूँगा!
देखो! फिर अपने वादे पर खरा उतरा हूँ मैं!"
"वीर!"
" हाय!
उसने पुकारा कुछ ऐसे मेरा नाम
कि अपने ही नाम से मोहब्बत हो गयी!"
वाणी उन पँक्तियों को सुनकर वीरक को छूने आगे बढ़ी, आँखों से झरते निर्झर के कारण धुँधले से दिखते वीरक को!
" छू ही तो नहीं सकते एक दूजे को पगली! यही तो विडम्बना है हम दोनों के अस्तित्व की अब!"
वाणी का हाथ जैसे हवा को चीरकर झुक गया, जहाँ वीरक खड़ा था! वाणी वहीं धम्म से बैठ गयी!
" क्यों वीरक? क्यों?"
"थक गया था पगली! जन्मान्तरों से भटकते हुए, एक ही चाह हृदय में लिये हुए, जो फिर पूरी नहीं हुई! तुमसे किया यही वादा तो ना निभा पाया वीरक! वादा नहीं निभा पाया तुम्हारा कारिक, सुनन्दिनी!"
वाणी को ध्यान हो आयी वह कथा, जो कभी वीरक ने सुनाई थी! पर उससे ज्यादा जरूरी था कि क्यों थक गया वह वीरक, जिसे लोग पर्वत से भी दृढ़ मानते थे! वह वीरक जिसने कई साहस खो चुके लोगों को जीवन जीना सिखाया!
" तुम हार गए वीरक? तुम!...तुम थक गए? तुम!"
" अक्सर टूट के बिखरे लोग ही साहस का मूल्य समझते हैं पगली! जो दूसरों को जीना सिखाये, अक्सर वह खुद हार चुका होता है!"
" पर क्यों वीरक? क्यों? क्यों हार मान ली? क्यों छोड़कर चले गए अपनी पगली को?"
"“दिल को इसी फ़रेब में रखा था उम्रभर...,
बस इस इम्तिहाँ के बाद...कोई इम्तिहाँ नहीं।”
" सीधे सीधे नहीं बता सकते! अब भी नहीं?"
वाणी का रुदन बढ़ता जा रहा था! चेहरा आँसुओं से पूरी तरह भीग चुका था!
" चलो छोड़ो! पर इसका एक लाभ है वाणी!"
वाणी ने वीरक की ओर देखा, जैसे ना चाहते हुए भी पूछ रही हो कि क्या?
"अब जब भी याद करोगी, तुम्हारे पास होऊँगा! ये अलग बात है कि बस तुम ही देख सकती हो इस पगले को! तुम्हारे पगले को! डरोगी नहीं ना?"
इतना कहकर वीरक अपनी चिरपरिचित मुद्रा में हँस पड़ा!
" वाणी!....वाणी!....क्या हुआ? किससे बातें किये जा रही हो? रो रही हो क्या?"
वाणी की बड़ी बहन कुमुद उसके रोने की आवाज सुन नीचे से उसके कमरे में आ गयी थी!
वाणी का ध्यान जब दीदी से वीरक की ओर गया, तो फिर वही! वही खालीपन! वही शून्य! उसके हृदय का शून्य और उसका अकेलापन! और वहीं फूट-फुटके रो पड़ी वीरक की पगली!
" वाणी!...क्या हुआ जी? वाणी!"
वाणी ने अपने पास आकर बैठी कुमुद को गले लगा लिया और बस कुमुद का कन्धा भीगता चला गया!
तभी जैसे एक मद्धिम स्वर वाणी के कानों में सुनाई दिया!
" मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ पगली! रोना नहीं! तुम्हारी आँखों से गिरते हुए हर बूँद आँसू मेरे इस अस्तित्व को अपने साथ बहा ले जायेंगे पगली! रोना नहीं, बिल्कुल नहीं! मैं हरपल तुम्हारे साथ हूँ! हरपल!"
©देव
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