प्रेम! समझते हो?
प्रेम जानते हो? प्रेम को समझते हो? ●●●●●●●●●●●●●●●●●●● तुम कहते हो, प्रेम को समझते हो! प्रेम को? युग बीत गए परिभाषा गढ़ने में साज समय के टूट गए इसे समझने में और, और तुम कहते हो तुम प्रेम समझते हो! दम्भ का मर्दन हुआ दर्प का दलन हुआ प्रेम न समझ पाया और तुम कहते हो प्रेम को समझते हो! कृष्ण ने कभी कुंजों में राघव ने कभी रण में इसे परिभाषा दी किसी ने इसे तजा किसी ने इसीके लिए रण था रचा दो विपरीत ध्रुवों से जिसे नारायण समझा न सके और, और तुम कहते हो तुम प्रेम समझते हो? शिव ने बिछुड़ कर जिससे जग को तजा जिसके लिए धूर्जटी ने नंदनवन रचा दो अतियों में होकर भी जो प्रेम को न समझा सका और तुम कहते हो तुम प्रेम को समझते हो! भव से जो पार उतारतीं हैं जो शव से जड़ को, चेतन शिव बनाती हैं उन्हें भी दो जन्म लेने पड़े अग्नि के दाह भी सहने पड़े और तुम कहते हो, कि प्रेम को समझते हो जग समझे इस हेतु परा-प्रकृति को तजा जग समझे इस हेतु परमा-प्रकृति को चुना कभी सहस्रों के रसधार बने कभी मीरा के गिरधर-गोपाल बने फिरभी न समझ सके जो और, और तुम कहते हो तुम प्रेम समझते हो? सरि का पयोधि से मिलना है प्रेम त...