Posts

Showing posts with the label प्रेम गीत

पिशाच

Image
तुम्हारी स्मृतियों पर पलने वाला  पिशाच हूँ मैं! जैसे किसी पिशाच का जीवन मानव-रक्त की उपलब्धता पर है ठीक वही तो हूँ मैं! तुम्हारी स्मृतियों पर पलता है जीवन मेरा! जैसे किसी पिशाच की शिराओं में दौड़ता है रक्त किसी और का और दौड़ती है  उसके जीवन की गाड़ी! ठीक वही तो है मेरी कथा रक्त बनकर दौड़ती हैं तुम्हारी स्मृतियाँ और दौड़ती लग रही है मेरी नाड़ी! जैसे मानव रक्त के बिना पीत वदन हो जाता है वह पिशाच मेरी भी होती है वही दशा कुछ न होने का आभास हर लेता है मेरे नयनों का प्रकाश नहीं सूझता कुछ जबतक पुनः इस हृदय की लपलपाती दीर्घ जिह्वा को दे न दूँ तुम्हारे स्मृतियों का प्राश अब तो साँसे भी क्षीण सी चलती हैं कभी धौकनी सी तेज कभी रुक रुक के झटके से उखड़ती हैं जब जब नहीं मिलता तुम्हारे स्मृतियों का साथ मन डूबता है उतराता है गर्त में गिरता जाता है खोजता है किनारा जहाँ होती हैं  स्मृतियाँ तुम्हारी तिनके का सहारा और, तुम्हारी स्मृतियों के  प्राशन पर जीवित रहता है स्मृतिभोजी ये पिशाच! चित्र गूगल से साभार

डाह है तुमसे!

Image
तुमसे डाह का सा सम्बंध है मेरा डाह! प्रेम में होकर भी डाह? विचित्र! परन्तु सत्य! ये डाह दोधारी तलवार सा है तुमसे प्रेम है सत्य है! परन्तु, तुम्हारे प्रेम की तीव्रता से अभिभूत आकण्ठ डूबा हुआ मैं डाह करता हूँ तुमसे क्यों? क्योंकि मुझमें नहीं दिखती  वह त्वरा प्रेम की मुझमें नहीं दिखता  वह समर्पण प्रेम का जिससे प्रतिदिन भीगता हूँ मैं जिसमें चलती है श्वांस मेरी जिससे मिटती है क्षुधा मेरी जिससे छीजती है तृष्णा मेरी परन्तु प्रेम होकर भी  मैं नहीं हूँ प्रेम में तुम जैसा मैं प्रेम को हूँ  साँस संग लेता तुम प्रेम ही हो मैं प्रेम से हूँ भीगता तुम वर्षा प्रेम की हो मैं प्रेम में ही होता श्रान्त तुम श्रान्ति प्रेम की हो मैं प्रेम में हूँ तुम प्रेम ही हो ये प्रेम में होना और प्रेम ही होना इनका अंतर ही है मेरे डाह का हेतु! चित्र साभार biswal भैया की वाल से

क्या बताऊँ तुम्हें

Image
क्या बताऊँ तुम्हें- ●●●●●●●●●● तुमसे कहूँ क्या धरा? क्या बताऊँ तुम्हें? मैंने देखी है अपनी ही मृत्यु अपनी ही आंखों से देखा है अपनी साँसों का धीरे-धीरे कर रुक जाना क्या बताऊँ तुम्हें कि बन्द किया है अपनी खुली आँखों को अपने उंगलियों के पोरों से और देखा है आंखों में जलते दिए का बुझ जाना क्या बताऊँ तुम्हें धरा? क्या बताऊँ तुम्हें कि कैसे सुना है अपने ही कानों से अपने दौड़ते धड़कनों का धक्क से ठहर जाना? क्या बताऊँ तुम्हें धरा? क्या बताऊँ तुम्हें कि कैसे तुम्हारी स्मृतियों का चित्रपट चलते चलते ठहरा? कैसे बताऊँ क्या था उसका रुक जाना? कितनी स्मृतियाँ! कितने जन्मों की! हर बार तुम्हारा होना हर बार तुमसे बिछड़ जाना क्या बताऊँ तुम्हें धरा? कैसे बताऊँ तुम्हें, वह कथा जिसमें चलता रहा सहस्रों बार जन्मना तुमसे मिलना मिलके बिछड़ जाना! क्या बताऊँ तुम्हें धरा? ©देव चित्र गूूूगल से साभार