डाह है तुमसे!

तुमसे डाह का सा सम्बंध है मेरा
डाह! प्रेम में होकर भी डाह?
विचित्र! परन्तु सत्य!

ये डाह दोधारी तलवार सा है
तुमसे प्रेम है सत्य है! परन्तु,
तुम्हारे प्रेम की तीव्रता से अभिभूत
आकण्ठ डूबा हुआ मैं
डाह करता हूँ तुमसे
क्यों?
क्योंकि मुझमें नहीं दिखती 
वह त्वरा प्रेम की
मुझमें नहीं दिखता 
वह समर्पण प्रेम का
जिससे प्रतिदिन भीगता हूँ मैं
जिसमें चलती है श्वांस मेरी
जिससे मिटती है क्षुधा मेरी
जिससे छीजती है तृष्णा मेरी

परन्तु प्रेम होकर भी 
मैं नहीं हूँ प्रेम में तुम जैसा
मैं प्रेम को हूँ 
साँस संग लेता
तुम प्रेम ही हो
मैं प्रेम से हूँ भीगता
तुम वर्षा प्रेम की हो
मैं प्रेम में ही होता श्रान्त
तुम श्रान्ति प्रेम की हो
मैं प्रेम में हूँ
तुम प्रेम ही हो

ये प्रेम में होना
और प्रेम ही होना
इनका अंतर ही है
मेरे डाह का हेतु!

चित्र साभार biswal भैया की वाल से

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