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वीरक-वाणी ---जरूरत-जरूरी

वाराणसी का चौसट्टी घाट, अक्टूबर का महीना, अभी भी माता गंगा का जल घाट की ऊपरी सीढ़ियों से कुछ ही नीचे बह रहा था! उसी घाट के द्वार पर बैठा था उन घाटों का चीर-परिचित चेहरा..... वीरक!  सहसा एक व्यक्ति विक्षिप्त सा स्वयं में ही बड़बड़ाता हुआ वहाँ आ बैठा! जो ना जाने क्या क्या कहे जा रहा था, पर वीरक तो कहीं किसी और ही लोक में खोया था! दृष्टि उछाल मारती गंगा जी की लहरों पर और मन किन्हीं उछलती गिरती स्मृतियों पर अटका था!