पिशाच
तुम्हारी स्मृतियों पर
पलने वाला
पिशाच हूँ मैं!
जैसे किसी पिशाच का जीवन
मानव-रक्त की उपलब्धता पर है
ठीक वही तो हूँ मैं!
तुम्हारी स्मृतियों पर पलता है
जीवन मेरा!
जैसे किसी पिशाच की शिराओं में
दौड़ता है रक्त किसी और का
और दौड़ती है
उसके जीवन की गाड़ी!
ठीक वही तो है मेरी कथा
रक्त बनकर दौड़ती हैं
तुम्हारी स्मृतियाँ
और दौड़ती लग रही है
मेरी नाड़ी!
जैसे मानव रक्त के बिना
पीत वदन हो जाता है
वह पिशाच
मेरी भी होती है
वही दशा
कुछ न होने का आभास
हर लेता है
मेरे नयनों का प्रकाश
नहीं सूझता कुछ
जबतक पुनः
इस हृदय की लपलपाती
दीर्घ जिह्वा को दे न दूँ
तुम्हारे स्मृतियों का प्राश
अब तो साँसे भी
क्षीण सी चलती हैं
कभी धौकनी सी तेज
कभी रुक रुक के झटके से
उखड़ती हैं
जब जब नहीं मिलता
तुम्हारे स्मृतियों का साथ
मन डूबता है उतराता है
गर्त में गिरता जाता है
खोजता है किनारा
जहाँ होती हैं
स्मृतियाँ तुम्हारी
तिनके का सहारा
और,
तुम्हारी स्मृतियों के
प्राशन पर जीवित रहता है
स्मृतिभोजी ये पिशाच!
चित्र गूगल से साभार
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