पता है तुम्हें?
पता है तुम्हें!
मैं नहीं जानता प्रेम क्या है?
क्या है किसीके प्रेम में होना?
पर जानता हूँ इतना कि,
जब तुम्हारे कुंतल से छनकर आती धूप
मेरे मुख पर पड़ती है तो,
सादियों से जमी मेरे हृदय की परत पिघलने लगती है,
और मुझे आभास कराती है मेरे जीवित होने का
पता है तुम्हें!
जब गर्म दोपहरी में यही केश मेरे मुख पर पड़ती धूप को अपनी छाया से हर लेते हैं तो,
हर लेते हैं जीवन के संघर्षों से उपजी तपन को,
शीतल कर देते हैं मेरे हृदय के ताप को,
संतोष के सुख से भर देते हैं, जिसे जाना न था कभी
पता है तुम्हें!
मैं नहीं जानता प्रेम क्या है?
पर जब तुम मेरे हाथों को अपने कोमल हाथों में लेती हो,
रोम रोम हर्षित हो जाते हैं मेरे, जो मृत ही पड़े थे सदैव से
तुम्हारे हाथों की रेखाओं में दिखता है भाग्य मेरा,
प्रकाश से भरा हुआ, जिसमें था केवल अँधियारा पसरा हुआ
पता है तुम्हें!
मैं नहीं जानता प्रेम में होना क्या है?
पर, जब तुम आती हो
एक साँस सी आती है साथ तुम्हारे,
नहीं तो एक शव ही तो था तुम्हारे आने से पहले,
एक चलता फिरता, भावहीन मुख वाला शव
परन्तु आज आनन्द से नाचता है अस्तित्व मेरा,
जीवन है मेरे कोशों में, मेरी शिराओं में
और जीवित हूँ मैं! पता है तुम्हें?
पता है तुम्हें!
मैं नहीं जानता कि प्रेम है क्या?
पर, अब विद्रोही होने को होता है मन,
लड़ जाना चाहता है तुम्हारे लिये,
किसी देव से, किसी प्रारब्ध से,
नहीं चाहता बिछुड़ना, तुमसे! अपनी साँसों से!
पता है तुम्हें!
मैं नहीं जानता प्रेम क्या है?
क्या है किसीके प्रेम में होना?
बस जानता हूँ तुम्हें और,
जानता हूँ क्या है तुम्हारा होना मेरे लिये
पता है तुम्हें!
©देव
चित्र गूगल से साभार
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