कारिक-सुनन्दिनी -- गाथा जन्मों की - भाग-१

#जन्मान्तर_भाग_१

कहते हैं ये कथा जिसने भी सुनाई, उसे ऐसे ही भाग्य से होकर गुजरना पड़ा है!

आज काफ़िर ये कथा सुना रहा है, क्योंकि जो चिता से होकर गुजर चुका हो, उसे चिता से भय कैसा?

जो सबकुछ खो चुका हो, उसे खोने का भय कैसा?
 तो चलिए, सुनाते हैं वो कथा!

जन्मान्तर- कथा जन्मों की- भाग-१
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 धू-धू कर जलती चिता से उठती लपटें, घनघोर वर्षा से भी शान्त नहीं हो रही थीं! जैसे लगता था कोई ऐसा लेटा है उस चिता में, जिसकी आत्मा की अगन शान्त ही नहीं होना चाहती, देह के शान्त हो जाने के पश्चात भी!

उसी चिता के सम्मुख बैठा था एक मुण्डित मस्तक, गैरिक वस्त्रों में लिपटा, कहीं अपने में ही खोया एक सन्यासी सा दिखने वाला मनुज! 
 चिता की जलती लपटें वर्षा के झरते जल में भी स्पष्ट दिखते उसके झरते अश्रुओं से प्रतिबिम्बित होकर उसके गौरवर्ण मुख को एक अलग ही आभा दे रही थीं! यदि कोई सुन सकता तो सुनता उसके उन अधरों को कहते हुए...

" हम अवश्य मिलेंगे नन्दिनी! महाकाल पशुपतिनाथ के चरणों में यदि एक पल को भी मेरी सच्ची श्रद्धा रही है! यदि उन्हें एक पल को भी निज प्राणों को अपूर्व श्रद्धा से अर्पित किया है, तो उसके प्रताप से हम फिर मिलेंगे नन्दिनी! ये वचन है मेरा, ये वचन है इस कारिक का तुम्हें!"
 जलती चिता को अपलक देखते हुए वह स्वयं में खोया हुआ कहे जा रहा था!
अपार पीड़ा और विषाद के मध्य एक दृढ़ निश्चय के दीप्ति से दमकता उसका मुख ऐसे लग रहा था, जैसे वर्षाकालीन मेघों के बीच दिखते निशाचर चन्द्र के दीप्ति से काले, श्याम मेघ भी  श्वेत हो उठे हों!

सहसा उसके दृढ़ निश्चय से भरे अश्रुपूरित नेत्रों में तैरने लगी अतीत की स्मृतियाँ, और कानों में गूँजने लगी वे ध्वनियाँ, जो कभी उसके अधरों ने उच्चारे थे!

" बुद्धम् शरणम् गच्छामि
  संघम् शरणम् गच्छामि
 धम्मम् शरणम् गच्छामि"

हवाओं में गूँजते नाद के साथ कषाय वस्त्र पहने, मुण्डित मस्तक, नीचे झुकी हुई दृष्टि के साथ बौद्ध भिक्षुओं का समूह सधे हुए कदमों से मार्ग पर चला आ रहा था! जैसे चलते हुए भी किसी ध्यान की अवस्था में हों!

मार्ग में उपस्थित जन सम्मान सहित उन्हें मार्ग दे रहे थे, रास्ते से बगल होकर! सहसा उस समूह के पग अपने आगे चल रहे वरिष्ठ भिक्षुक के रुकने से रुक गए, क्योंकि बीच रास्ते में खड़ी थी,  एक कोमलाङ्गी!

 गोरी सी, जैसे दूध में एक चुटकी केसर डाल दी गयी हो! सुनहले भूरे बाल, हल्की नीली आँखें, चटक लाल रंग के वस्त्र पहने एक लड़की! जो एकटक उस समूह को देखे जा रही थी! वय यही कोई सत्रह या अठारह वसन्त देखे होंगे उसने! मुख पर झलकती मासूमियत और अल्हड़पना!

" सुनन्दिनी! पुत्री! ये क्या? मार्ग दो भिक्षुओं को! क्यों रास्ता रोके खड़ी हो?"

 एक अधेड़ से दिखने वाले व्यक्ति ने उस लड़की को जोर देकर पुकारा!

" हाँ! क्या कुछ कहा पिताजी?"
सुनन्दिनी जैसे किसी अन्य ही लोक में थी!

" मार्ग दो पुत्री भिक्षुओं को!"
उस अधेड़ से दिखने वाले व्यक्ति ने सुनन्दिनी का हाथ पकड़ उसे मार्ग से परे हटाते हुए कहा!

पहाड़ी नदी सी अल्हड़ उस लड़की का नाम था सुनंदिनी! जो कि विश्वम्भरनाथ ठाकुर की एकलौती पुत्री थी! और वो अधेड़ व्यक्ति ही थे विश्वम्भरनाथ ठाकुर! किन्नौर क्षेत्र के उस पर्वतीय गाँव के एक सम्मानित व्यक्ति! ठाकुर समुदाय के अभिन्न अंग व कार्य से शिक्षक! वैसे तो उनके पास पर्याप्त पैतृक भूमि थी, जिससे आय की कोई समस्या ना थी, परन्तु उस पहाड़ी गाँव के बच्चे निरक्षर ना रह जायें, इसलिए वे निःशुल्क पढ़ाने का कार्य करते थे!

" पुत्री! तुम मध्य मार्ग में क्यों खड़ी हो गयी? तुमने भिक्षुओं का मार्ग क्यों रोका? ऐसी अभद्रता तुमसे हो, यह समझ से परे है!"

सुनन्दिनी तो जैसे किसी अन्य लोक में ही थी, और उस भिक्षुओं के समूह को निहारे जा रही थी!

" सुनन्दिनी! कहाँ खोई हो पुत्री?"
इस बार ठाकुर विश्वम्भरनाथ ने सुनन्दिनी को हिलाते हुए पूछा!

" हाँ! क्या?"
सुनंदिनी तो जैसे अपनी सुध-बुध उस भिक्षुओं के समूह में ही खो बैठी थी, जो कि अब आँखों से ओझल ही होने वाला था!

" पिताजी!"

" कहो नन्दिनी!"

ठाकुर साहब सुनन्दिनी को कभी प्यार से नन्दिनी तो कभी  नन्दू तो कभी सुनन्दिनी कहते थे!

"वो भिक्षुक!....वो विचित्र नहीं लग रहा आपको? इस ठण्ड में सभी, यहाँ तक कि भिक्षुक भी पूर्णरूप से अपने ठण्ड के वस्त्रों में हैं, हम पर्याप्त से अधिक कपड़ों में भी ठिठुरे जा रहे और वह केवल एक ओर के कन्धे पर पतला सा उत्तरीय डाले चला जा रहा है और..."

" अरे वो भिक्षुक हैं नन्दू! वह उनके दैनिक साधना का अंग है!" ठाकुर साहब ने बात बीच में ही काटते हुए कहा!

" अरे पिताजी! बात तो सुनिए! बीच में महिलाओं सा टोक देते हैं!"
ठाकुर साहब की दुलारो बेटी थी सुनन्दिनी! केवल वही थी जो ठाकुर साहब को बच्चों सा झिड़क देती थी! दुलार में एक पिता भी पुत्री के सम्मुख एक नन्हा बालक ही होता है!

" अच्छा कहो भई! मुँह ना फुलाओ!"

" तब क्या ना! बहुधा बीच में ही बात काट देते हैं आप!"

" क्षमा महाराज! कहो क्या कह रही थी?"

" पिताजी! ये वस्त्र की बात तो ठीक है, परन्तु क्या आपने उस भिक्षुक के स्कंध से लेकर आगे तक और पुनः पीछे गम्भीर घाओं के चिन्ह देखे क्या? जैसे किसी तीव्र धार, जैसे किसी कृपाण के घाव हों! कई जगहों पर उसकी भुजाओं पर भी वैसे ही घाओं के चिन्ह हैं! देह की बनावट से भी वह भिक्षुक नहीं दिखता पिताजी! और ये समूह तो सदैव मठ से निकलकर इस मार्ग से जाता है, परन्तु वह भिक्षुक, यह प्रथम अवसर है कि वह दिखा! विचित्र सी पीड़ा दिखती है उसके मुख पर! अन्य भिक्षुओं सा शान्त नहीं है वह! जैसे उसके अन्दर पीड़ा का चक्रवात उमड़घुमड़ रहा हो!"

 यही बातें दो सौ वर्षों बाद उस क्षेत्र से कहीं दूर किसी मैदानी क्षेत्र में एक लड़की अपने सहेली से भी कहने वाली थी! यही तो है बातों का जन्मान्तर!

" वो! अरे वो नया भिक्षुक है! अभी कुछ ही दिन हुआ है उसे बौद्ध पंथ को स्वीकारे! कारिक नाम है उसका! गोरखाओं के संग आया था! एक दुर्धष योद्धा है वह, गोरखाओं के एक टुकड़ी का नायक हुआ करता था वह!"

"कारिक! योद्धा! गोरखा!"

सुनन्दिनी जैसे मन ही मन बुदबुदाई!

" कुछ ऐसा घटा रामपुर क्षेत्र में कि हृदय परिवर्तन हो गया!  अभी तुम्हारी ही वय का होगा, मुख्य लामा बता रहे थे जब विक्रमसिंह जी ने ऐसे ही तुम्हारी तरह प्रश्न किया था!

 वहाँ से इसी मठ में चला आया और बौद्ध पंथ स्वीकार कर  भिक्षुक बन गया!

 अब तू घर चल! जो भी अन्य बातें जाननी हैं, वह घर पर बताता हूँ! हिमपात होने की संभावना है! चल!"

सुनन्दिनी ने आकाश की ओर दृष्टि की तो पिताजी की बातें सत्य प्रतीत हुई! उसने भिक्षुओं के दिशा की ओर देखते हुए मन ही मन बुदबुदाया!

" कारिक!"

किसीको क्या ज्ञात था कि जन्मोतक चलने वाली एक गाथा की शुरुआत हो चुकी थी! जिसमें थी थोड़ी सी खुशियों के साथ पहाड़ सी पीड़ा, नदियों सा विछोह, हिम सी मृत्यु की परछाईं! जो दो मासूम हृदयों का साथ दो जन्मों तक नहीं छोड़ने वाली थी!

 

क्रमशः

©काफ़िर बनारसिया

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