अब तुम कम याद आते हो!

अब तुम कम याद आते हो,
किसी नदी के रेत के टीले से, जिसपर कभी बैठते थे हम
जिसपे कभी पड़े थे निशान! साथ-साथ तेरे मेरे कदमों के
हाँ, अब तुम कम याद आते हो

वह बहकती हवा का चलना, तेरे आने का अंदेशा
वह सीढ़ियों की खटपट, और तेरे आने का संदेशा
सही कहा! अब तुम कम याद आते हो

घिर के जो आये बादल, वो पानी की बूँदें
वो तेज बरसाती झोंका, और तेरी चितवन
सही कहा! अब तुम कम याद आते हो

तुम्हारी तस्वीर को अबतक दीमक ना लगने दिया
किसी मोरपंख सा सजा के रखा है उन्हें बटुए के तहखाने में
हाँ! सही कहा! अब तुम कम याद आते हो

दुनिया ने झिंझोड़ा है भीतर तक मुझे, 
तिनका तिनका सा हो गया हूँ
फिर भी सँजो के रखा है सीने में तुझे, सहेज कर
हाँ! सही कहा! अब तुम कम याद आते हो

क्योंकि याद आने के लिए भूलना है जरूरी
साँसों के साथ चलते हो तुम
धड़कन के संग धड़कते हो तुम
तुम्हें भूला ही कब, कि याद करूँ
हाँ! सही ही कहा! अब तुम कम याद आते हो!

अब तुम कम याद आते हो!


©देव

Comments

Popular posts from this blog

पता है तुम्हें?

डाह है तुमसे!

हाँ मैं हिन्दू हूँ!