सती-विरह
सती-विरह
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विरह दाह से दग्ध हुआ है
मेरे अन्तस् का नीर सलिल
त्याग मुझे क्यों चली गयी
शून्य हुआ ये अनन्त नील
वो मणि-मुक्तक जो टाँके थे
इस गगन में हमने तुमने जो
विदीर्ण हो गए बिछड़ के तुमसे
कृष्ण-विवर से लगते वो
सती तुम्हीं से रसमय था
वृहद सृष्टि का सृजन अनूप
तुमबिन चुभती कलियाँ हैं
दग्ध कर रही धरा-धूप
तुम बिन रक्त की सरि हहरती
नयनों में नीर सलिल नहीं
हृदय में उठती ज्वाला है नित
मन को अब संतोष नहीं
फुफकार रही अमर्ष की अग्नि
जग को राख करूँ इस पल
जिसने तुमसे विलग किया
वो देख सके न आगत कल
दोष रहा था मेरा क्या कुछ
वैरागी था अनन्त काल से
बैठ हिमालय विरक्त भाव
कुछ भी आस नहीं काल से
ना ही प्रतीक्षा प्रेम की ही
ना ही किसी से मोह किया
ना ही रोष पाला था हिय में
ना ही किसी से नेह किया
जग के हित में जुड़ा था तुमसे
नारायण ने दिया था बन्धन
त्रिपुरासुर का अंत है करना
धरा त्रास से करे है क्रन्दन
जैसे जैसे समय था बिता
तुमसे हिय ने प्रेम किया
छुड़ा के शृंग शीतालय का
निर्मोही को था मोह लिया
परन्तु काल ने खेला है
कालजयी से खेल ये कैसा
शिव को शव तुम बना गयी
ये निलय लगे है मरघट जैसा
समझाया था, बहुत तुम्हें तब
हठ को अपने तजो सती
पिता तुम्हारे रुष्ट अभी हैं
बैठ निहारो काल-गति
आभास मुझे था आगत अपना
वैरागी बन छोड़ा जग था
बैठ अकेले रमा के धुनि
राम-भाव को जपता मैं था
मिलन का अपने अंत निकट
जानके हिय घबराता था
देख गति करमन की न्यारी
तुमसे कह नहीं पाता था
फिर भी तुमको टोका था तब
बालहठ जब तुमने ठानी
प्रस्थान समय भी रोका था तब
जाने लगी जब तुम अभिमानी
परन्तु विधि के हाथों बद्ध मैं!
जिसने विधि की रचना की
कह न सका, मत जा हे गौरी!
बेला आन पड़ी रयना की
क्रमशः-
✍️देव
चित्र गूगल से साभार
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