मन को समझाऊँ कौन विधि

मन को समझाऊँ कौन विधि
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यदि पथ के अँधियारे से, 
पथिक तुझे डर लगता है
तो अंतर के दीपक में 
साहस का तू स्नेहन भर
लगा मनोबल की बाती
आत्मतेज की ज्योत जला

अँधियारा न रहना है, 
न रहा कभी चिरंतन है
धैर्य की लाठी हाथ में ले, 
चैतन्य हो तु आगे बढ़
अनेक भ्रमों के सांप छछूंदर, 
इनको तू अब दूर भगा

एक बार गिरे तो उठ जा फिर, 
फिरसे अपनी दौड़ लगा
जो पड़ा रहा और उठा नहीं
तो जग में कौन सहारा है
जो गिर गिर के भी रहे दौड़ते
लभ्य उन्हें जग सारा है

वीरों की है थाती तू
धिरों का है अंश बड़ा
जिनने जग को जीता है
उनका है तू रक्त सगा
नाम न उनका धूमिल कर
दृढ़ हो अब तू अलख जगा

लाख बवण्डर, दावानल हो
कौन अमर्त्य को रोक सका
हुँकार अहं ब्रह्मास्मि का 
मस्तक को तू ऊँचा कर
घुस जा कान्तर में डटके
आगे है तेरा लक्ष्य खड़ा

बोल भवानी, हर हर कर
शिरा में शोणित रक्त बहा
बाँध माथ पे भगवा पग
अरि से अब तू आंख लड़ा
रुक ना अब तू मध्यधार
आगे है तेरा स्वर्ग पड़ा

अवसान सूर्य का भ्रम है एक
पुनः जो उसको आना है
तेरे अंतर में उसको 
ज्योत जो एक जलाना है
ये भूमि तुझको बुला रही
इसका कर्ज चुकाना है
इसका कर्ज चुकाना है

✍️देव

चित्र गूगल से साभार

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