क्यों नहीं बरसते दृग मेरे
क्या उत्तर दूँ तुम्हे
क्यों नहीं बरसते दृग मेरे?
कैसे बताऊँ
तुम्हारे विछोह से विदीर्ण
हृदय की करकन से उपजी टीस!
तुम्हारी स्मृतियों के तीक्ष्ण कोनों से
क्षत-विक्षत मेरे हृदय की पीड़ा!
द्रवित हो दृगों के सोतों से
कैसे अहर्निश रक्तसरि सी बहती थी
कैसे हर तटबंध टूटे थे
कैसे मेरा अस्तित्व आप्लावित हो
जलमग्न हुआ पड़ा था
तुम्हारी स्मृतियों के द्रुतप्रवाह में
परन्तु कबतक?
कबतक हहरती वह वाजिनी!
सरि के उद्गम को, उस पीड़ा के हिमनद को
कभी तो सुखना ही था
और शेष छोड़ जाना था
एक अमिट, अतल गहराई से खोह को
जहाँ कभी तुम्हारे संग बिते पलों की
अमृतधारा बहती थी
जहाँ कभी विछोह के ज्वार से उफनती
रक्तसरि हहरती थी
कबतक?
कहीं सुदूर हृदय-हिमालय के किसी कोने में
उस घनीभूत पीड़ा का हिम
अब भी चिटकता है,
अल्प ही सही
द्रवित होता है
जब जब इस एकाकीपन के मरुस्थल से चलती
विरह-अग्नि की लपट से तप्त
स्मृतियों की वायु उसे थपेडती है
और पुनः फूट पडती है
उस रक्त-सरि की धारा
पुनः उपस्थित होता है प्रलय दृश्य
धराशायी हो जाता है हर जतन का दुर्ग
और शेष रह जाता है
तुम्हारे स्मृतियों से हारा, संहारित
हृदय-नगर
जहाँ खेलती थी वे रमणीय स्मृतियाँ हमारी
फिर पुनः बाँधता हूँ ढाँढस का तटबन्ध
पुनः समझाता हूँ हृदय बाँवरे को
जबतक पुनः स्मृतियों का प्रलय न आये!
चित्र गूगल से साभार
©देव
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