लोकतंत्र सपेरे की बीन

लोकतंत्र की रीत! 
बड़ी विचित्र!
विधाता विस्मित!

कहते हैं!
लोक का है राज
लोक ही करते लोक का काज

क्या सत्य?

लोक के राज में
तंत्र का है बोलबाला
लोक है विस्मृत
बुझे न कोई!
दिग्भ्रमित, मूढ़-खचित, मतवाला!

भेड़िया-धसान
अनेकों प्रमाण

चार वर्ष और छः मास
जनता के जीवन का विकट त्रास
नेताओं का मधुमास!

जब आते हैं अंत के दिन
सपेरा निकलता ले हाथ में बीन
बजाता है धुन मोहिनी
मुफ्त की बिजली मुफ्त का पानी
हर बार की यही कहानी

जन में से निकलते हैं लोग
भागे करते मुक्त का भोग
जैसे सर्प को सपेरा नचाता है
बना नर्तकी लोक नचाता है

विस्मृत करता है वह भोग
चार वर्ष छः मासे भुगता था जो रोग

मुक्त के फेरे में 
विस्मृत होता है सब त्रास
लोक ही बनते लोक की फाँस

है जादूगर का मायाजाल
लोक उचारे लोक की खाल
जैसे कुकुर लेता है अपने ही रक्त का रस
जनता निज को चूसे बने स्वयं ही मस

भूल वो जाता है
फिर पाछे पछताता है
पर पुनः कहानी दोहराएगी
अंत छह मास के छल में
चौवन मास भुलायेगी
भेड़िया-धसान की ये कहानी
फिर फिर दोहराई जाएगी
फिर फिर दोहराई जाएगी


©देव

चित्र साभार गूगल से










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