प्रेम हमारा त्रिक अणुओं सा
प्रेम हमारा त्रिक-अणुओं सा क्यूँ है?-
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तुम्हें तब भी प्रेम किया
जब तुमसे रुष्ट था।
जब तुमसे रुष्ट था,
उस पल भी तुमसे प्रेम किया।
ये प्रेम हमारा त्रिक अणुओं सा क्यूँ है?
आकर्षण में प्रतिकर्षण, प्रतिकर्षण में भी आकर्षण
जितना तुमसे विरह में तपा
समीप आया उतना ही तुम्हारे
जितना तुम्हारे समीप आया
उतना ही संकोच ने सिकोड़कर दूर किया
ये प्रेम हमारा भौतिकी के नियमों सा क्यूँ है?
इतिसिद्धम होकर भी सिद्ध नहीं
जितना ही तपता हूँ,
उतना ही शीतल होता हूँ एक संतोष के तोष से
जितना ही शीतल होता हूँ,
उतना ही एण्ट्रॉपी मुझे आकुल कर देती है तुम्हारे प्रेम की!
ये प्रेम हमारा ऊष्मागतिकी के नियमों सा क्यूँ है?
तपता हूँ शीतल होने के लिए,
शीतल होता हूँ विरह में तपने के लिए
ये प्रेम हमारा कभी रुद्धोष्म
तो कभी समतापी सा क्यों है
कभी केवल प्रेम पाने की एषणा
कभी जितना मिले उससे अधिक देने की चाहना
ये प्रेम हमारा भौतिकी के नियमों सा क्यूँ है?
क्यूँ है ये प्रेम निश्चित होकर भी इतना अनिश्चित?
✍️ देव
चित्र साभार बिस्वाल भैया की भित्ति से
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