ध्याऊँ कौन विधि?

शरद की अमा!
भगवती के चरणों में बैठा
उनसे ही सम्मुख
उन्हें निहारता
प्रश्न उठे हैं मन में
हे माँ!
तुम्हें ढूँढा सर्वत्र
रहती हो कहाँ?
बसती हो किसमें?
क्या रूप है तुम्हारा?
हे माँ!
कैसे ध्याऊँ तुम्हें?
किस रूप में ध्याऊँ तुम्हें?
प्रश्न उठता है! मथता है!
क्या सर्वसुन्दरी? भुवनमोहिनी?
विग्रह को शीश नवा उठा तो
सम्मुख एक कुरूपा भिखारन
एक सद्ययौवना नवब्याहता रूपवती लक्ष्मी
संग-संग
वहीं पड़ गया नतमस्तक!
पुनः विचारा
बालिका या षोडशी?
दाहिने एक माँ! गोद में नवजात भवानी
पार्श्व में षोडशी
अश्रु बह चले!
धन्य हो माँ!
धन्य है भाग्य मेरा!
पर पुनः जन्मा एक प्रश्न
जन्मों का मारा, आज प्रश्नों का मारा
श्यामा या गौरी?
अनाहत गूँज!
देख पगले!
गोद में श्यामा! पार्श्व में गौरी!
धन्य! धन्य!
पर,
मैं पामर!
वही प्रश्नों का मारा
कुमारी या प्रौढ़ा?
स्पन्दन हृदय के बोल उठे!
देख बावले!
श्यामा और अङ्क लिए माँ!
वाम पार्श्व में बैठी मातामह!
यही विचारता चला जा रहा
अपनी ही सुध में बेसुध
शिरोवेदना!
आते ही घर में, 
पड़ा जननी की गोद में
बन्द नयन
घोर रयन
क्या हो चयन?
सर्वत्र है तू! सबमें है तू!
इस अणु में! उस अनंत में! उस विभु में!
रूप में, अरूप में
धनी में, निर्धन में
नवजात में, वृद्धा में
षोडशी में, प्रौढ़ा में
श्यामा में, गौरी में
विग्रह में, शरीरी में
किस रूप ध्याऊँ?
किस रूप ध्याऊँ?
मैं अल्पमति!
मैं कुमति!
हो विकल खोले नयन
सम्मुख जननी का 
ममतामय वदन!
धन्य हो भवानी!
धन्य जगजननी!
धन्य तुम्हारी लीला!



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