पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम क्या है? क्या है किसीके प्रेम में होना? पर जानता हूँ इतना कि, जब तुम्हारे कुंतल से छनकर आती धूप मेरे मुख पर पड़ती है तो, सादियों से जमी मेरे हृदय की परत पिघलने लगती है, और मुझे आभास कराती है मेरे जीवित होने का पता है तुम्हें! जब गर्म दोपहरी में यही केश मेरे मुख पर पड़ती धूप को अपनी छाया से हर लेते हैं तो, हर लेते हैं जीवन के संघर्षों से उपजी तपन को, शीतल कर देते हैं मेरे हृदय के ताप को, संतोष के सुख से भर देते हैं, जिसे जाना न था कभी पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम क्या है? पर जब तुम मेरे हाथों को अपने कोमल हाथों में लेती हो, रोम रोम हर्षित हो जाते हैं मेरे, जो मृत ही पड़े थे सदैव से तुम्हारे हाथों की रेखाओं में दिखता है भाग्य मेरा, प्रकाश से भरा हुआ, जिसमें था केवल अँधियारा पसरा हुआ पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम में होना क्या है? पर, जब तुम आती हो एक साँस सी आती है साथ तुम्हारे, नहीं तो एक शव ही तो था तुम्हारे आने से पहले, एक चलता फिरता, भावहीन मुख वाला शव परन्तु आज आनन्द से नाचता है अस्तित्व मेरा, जीवन है मेरे कोशों में, मेरी शिराओं में औ...
तुमसे डाह का सा सम्बंध है मेरा डाह! प्रेम में होकर भी डाह? विचित्र! परन्तु सत्य! ये डाह दोधारी तलवार सा है तुमसे प्रेम है सत्य है! परन्तु, तुम्हारे प्रेम की तीव्रता से अभिभूत आकण्ठ डूबा हुआ मैं डाह करता हूँ तुमसे क्यों? क्योंकि मुझमें नहीं दिखती वह त्वरा प्रेम की मुझमें नहीं दिखता वह समर्पण प्रेम का जिससे प्रतिदिन भीगता हूँ मैं जिसमें चलती है श्वांस मेरी जिससे मिटती है क्षुधा मेरी जिससे छीजती है तृष्णा मेरी परन्तु प्रेम होकर भी मैं नहीं हूँ प्रेम में तुम जैसा मैं प्रेम को हूँ साँस संग लेता तुम प्रेम ही हो मैं प्रेम से हूँ भीगता तुम वर्षा प्रेम की हो मैं प्रेम में ही होता श्रान्त तुम श्रान्ति प्रेम की हो मैं प्रेम में हूँ तुम प्रेम ही हो ये प्रेम में होना और प्रेम ही होना इनका अंतर ही है मेरे डाह का हेतु! चित्र साभार biswal भैया की वाल से
हाँ मैं हिन्दू हूँ- ********** खजुराहो के मंदिर सा टूटा पड़ा हूँ हम्पी के अवशेषों सा लुटा पड़ा हूँ वो गौरव, अभिमान, वो तुंग शिखर हाँ मैं हिन्दू हूँ, भूमि पे गिरा पड़ा हूँ मैं काशी का विश्वनाथ, ज्ञान का देवता हूँ ज्ञानवापी के अँधियारे में घुटा पड़ा हूँ लेके कोई विप्र मुझे कुँए में शेष पड़ा है हाँ मैं हिन्दू हूँ, सदियों तक क्लेश सहा है मैं विद्या की देवी सा भग्न खड़ा हूँ शारदा के मठ का वो बुझा दिया हूँ ओंकार की ध्वनि अजानों में जो उलझी हाँ मैं हिन्दू हूँ, घाटी में मौन खड़ा हूँ रघुनंदन के चरणों में जो पुष्प चढ़ा था कोदण्ड कराल का शर बनके जो युद्ध लड़ा था जिसने म्लेच्छ की महिमा का है ध्वंश किया हाँ मैं हिन्दू हूँ, आज मैं षण्ढ पड़ा हूँ जिसने पाण्डव संग कौरवी युद्ध लड़ा जिसका पा आशीष धनंजय बाण बढ़ा जिसने यमुना-नीर को विषहीन किया हाँ मैं हिन्दू हूँ, उस कान्हे को भूल गया हूँ हिंगलाज में बनके ज्योति जलता था जो गर्देश-विनायक पे गर्वित हो नमता था जो जिसने कासिम, गोरी की शमशीरें झेलीं हाँ मैं हिन्दू हूँ, आज मैं पस्त पड़ा हूँ परन्तु, परन्तु भान रहे ये तुमको, मैं बप्पा रावल जिसने चाँद सितारे को किया था घायल अरब ...
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