Posts

सदियों तक फैली भूख

Image
दूर कहीं उठता धुँआ सदियों तक फैली भूख मेरी गहन कान्तर में भटकता मैं जन्मों से, कल्पों से, योनियों से पर ये भूख, अंत नहीं इसका कहीं दूर उठते धुएँ को देख हृदय की आस कुलबुलाने लगी अब मिटेगी, कभी न मिटने वाली ये भूख, ये मेरी जन्मों की भूख परन्तु, जब गया मैं उस कुटिया में, देखा! जीर्ण-शीर्ण! स्यात वर्षा में टपकते हुए छज्जे को जिनसे कहीं कहीं महीन धूप छीज के भूमि के सिलन को खा रही थी एक कोने में बैठी थी माँ! घेरे हुए बैठे थे चार शिशु! भूख से श्लथ मुख लिये उस पात्र में, लकड़ी की मद्धिम आँच पर पक रहा था दो मुट्ठी चावल और नमक और पक रही थी भूख! उन आठ आँखों की कि बस! अब भूख कटने वाली है! कई दिनों की भूख, भिक्षा के उस चावल से जो मिली थी दुत्कार की दृष्टि के संग पर द्वार पर खड़ा मैं सोच रहा था! बुदबुदाते माढ़ की उस महक से क्या मेरी ही रसना सक्रिय हुई थी? या सक्रिय हुई थी भूख की इच्छा उस छोटे से कुटीर संसार की मैं भूखा!  कल्पों से न मिटने वाली भूख लिए द्वार पे खड़ा, निरख रहा था भूख को, बुदबुदाते माढ़ को किसका अंत होगा मेरी भूख, जिसका अंत नहीं उन आठ आँखों की प्रतीक्षा का उन ममतामयी आँखों में बसने वाली...

लोकतंत्र सपेरे की बीन

Image
लोकतंत्र की रीत!  बड़ी विचित्र! विधाता विस्मित! कहते हैं! लोक का है राज लोक ही करते लोक का काज क्या सत्य? लोक के राज में तंत्र का है बोलबाला लोक है विस्मृत बुझे न कोई! दिग्भ्रमित, मूढ़-खचित, मतवाला! भेड़िया-धसान अनेकों प्रमाण चार वर्ष और छः मास जनता के जीवन का विकट त्रास नेताओं का मधुमास! जब आते हैं अंत के दिन सपेरा निकलता ले हाथ में बीन बजाता है धुन मोहिनी मुफ्त की बिजली मुफ्त का पानी हर बार की यही कहानी जन में से निकलते हैं लोग भागे करते मुक्त का भोग जैसे सर्प को सपेरा नचाता है बना नर्तकी लोक नचाता है विस्मृत करता है वह भोग चार वर्ष छः मासे भुगता था जो रोग मुक्त के फेरे में  विस्मृत होता है सब त्रास लोक ही बनते लोक की फाँस है जादूगर का मायाजाल लोक उचारे लोक की खाल जैसे कुकुर लेता है अपने ही रक्त का रस जनता निज को चूसे बने स्वयं ही मस भूल वो जाता है फिर पाछे पछताता है पर पुनः कहानी दोहराएगी अंत छह मास के छल में चौवन मास भुलायेगी भेड़िया-धसान की ये कहानी फिर फिर दोहराई जाएगी फिर फिर दोहराई जाएगी ©देव चित्र साभार गूगल से

अब तुम कम याद आते हो!

अब तुम कम याद आते हो, किसी नदी के रेत के टीले से, जिसपर कभी बैठते थे हम जिसपे कभी पड़े थे निशान! साथ-साथ तेरे मेरे कदमों के हाँ, अब तुम कम याद आते हो वह बहकती हवा का चलना, तेरे आने का अंदेशा वह सीढ़ियों की खटपट, और तेरे आने का संदेशा सही कहा! अब तुम कम याद आते हो घिर के जो आये बादल, वो पानी की बूँदें वो तेज बरसाती झोंका, और तेरी चितवन सही कहा! अब तुम कम याद आते हो तुम्हारी तस्वीर को अबतक दीमक ना लगने दिया किसी मोरपंख सा सजा के रखा है उन्हें बटुए के तहखाने में हाँ! सही कहा! अब तुम कम याद आते हो दुनिया ने झिंझोड़ा है भीतर तक मुझे,  तिनका तिनका सा हो गया हूँ फिर भी सँजो के रखा है सीने में तुझे, सहेज कर हाँ! सही कहा! अब तुम कम याद आते हो क्योंकि याद आने के लिए भूलना है जरूरी साँसों के साथ चलते हो तुम धड़कन के संग धड़कते हो तुम तुम्हें भूला ही कब, कि याद करूँ हाँ! सही ही कहा! अब तुम कम याद आते हो! अब तुम कम याद आते हो! ©देव

पता है तुम्हें?

Image
पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम क्या है? क्या है किसीके प्रेम में होना? पर जानता हूँ इतना कि, जब तुम्हारे कुंतल से छनकर आती धूप मेरे मुख पर पड़ती है तो, सादियों से जमी मेरे हृदय की परत पिघलने लगती है, और मुझे आभास कराती है मेरे जीवित होने का पता है तुम्हें! जब गर्म दोपहरी में यही केश मेरे मुख पर पड़ती धूप को अपनी छाया से हर लेते हैं तो, हर लेते हैं जीवन के संघर्षों से उपजी तपन को, शीतल कर देते हैं मेरे हृदय के ताप को, संतोष के सुख से भर देते हैं, जिसे जाना न था कभी पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम क्या है? पर जब तुम मेरे हाथों को अपने कोमल हाथों में लेती हो, रोम रोम हर्षित हो जाते हैं मेरे, जो मृत ही पड़े थे सदैव से तुम्हारे हाथों की रेखाओं में दिखता है भाग्य मेरा, प्रकाश से भरा हुआ, जिसमें था केवल अँधियारा पसरा हुआ पता है तुम्हें! मैं नहीं जानता प्रेम में होना क्या है? पर, जब तुम आती हो एक साँस सी आती है साथ तुम्हारे, नहीं तो एक शव ही तो था तुम्हारे आने से पहले, एक चलता फिरता, भावहीन मुख वाला शव परन्तु आज आनन्द से नाचता है अस्तित्व मेरा, जीवन है मेरे कोशों में, मेरी शिराओं में औ...

प्रेम हमारा त्रिक अणुओं सा

Image
प्रेम हमारा त्रिक-अणुओं सा क्यूँ है?- *************************** तुम्हें तब भी प्रेम किया जब तुमसे रुष्ट था। जब तुमसे रुष्ट था, उस पल भी तुमसे प्रेम किया। ये प्रेम हमारा त्रिक अणुओं सा क्यूँ है? आकर्षण में प्रतिकर्षण, प्रतिकर्षण में भी आकर्षण जितना तुमसे विरह में तपा समीप आया उतना ही तुम्हारे जितना तुम्हारे समीप आया उतना ही संकोच ने सिकोड़कर दूर किया ये प्रेम हमारा भौतिकी के नियमों सा क्यूँ है? इतिसिद्धम होकर भी सिद्ध नहीं जितना ही तपता हूँ, उतना ही शीतल होता हूँ एक संतोष के तोष से जितना ही शीतल होता हूँ, उतना ही एण्ट्रॉपी मुझे आकुल कर देती है तुम्हारे प्रेम की! ये प्रेम हमारा ऊष्मागतिकी के नियमों सा क्यूँ है? तपता हूँ शीतल होने के लिए, शीतल होता हूँ विरह में तपने के लिए ये प्रेम हमारा कभी रुद्धोष्म  तो कभी समतापी सा क्यों है कभी केवल प्रेम पाने की एषणा कभी जितना मिले उससे अधिक देने की चाहना ये प्रेम हमारा भौतिकी के नियमों सा क्यूँ है? क्यूँ है ये प्रेम निश्चित होकर भी इतना अनिश्चित? ✍️ देव चित्र साभार बिस्वाल भैया की भित्ति से

सनातन का क्या होगा?

Image
देव-धरा संवाद-१ ************** "देव! ए देव!" "हाँ! कहो धरा! क्या बात है?"  जैसे स्वयं मनु-सतरूपा प्रलय की जलराशि को निहारते हुए बैठे हों, देव और धरा भादों में उफनती जाह्नवी के तट पर बैठे थे। धरा ने देव से प्रश्न पूछने के भाव से उसे पुकारा, क्यूंकि देव तो सदैव की भाँति कहीं शून्य में खोया, स्वयं को भूला बैठा था। जबकि स्वयं प्रकृति उसके पार्श्व में, नयनों में उसके लिए अजस्र प्रेम की सरि लिए उसे निहार रही थी। धरा के रूप में! "देव!...हमारा क्या होगा?" "अर्थात?  कैसा हमारा क्या होगा?" " अरे बुद्धू! हमारा से तात्पर्य है, हम सनातन के पथिकों का! देख ही रहे हो सर्वत्र अब्राहमिक पन्थों के अनुयायी सनातनियों को कभी दीमक की तरह झारखण्ड, तमिलनाडु में अंदर से निस्तेज करते जा रहे हैं, तो कहीं केरल व पश्चिम बंगाल में अपने अन्य रूप में वधिक बनकर नष्ट करते जा रहे हैं!"  देव के अधरों पर स्मित हास्य उभर आया। ये विचार उसे स्वयं के प्रेम पर गर्वान्वित कर रहा था कि इस प्रिय-प्रेयसी के मिलाप में भी धरा को देश, धर्म की चिन्ता है। उसने अपने चिरपरिचित स्मित हास्य ...

पीड़ा कश्मीर की!

Image
सभ्यता का सूरज था उपजा, वेद ऋचाएँ रची गयीं ये पूण्य धरा थी शारदा की, यहाँ मनुजता छली गयी सेब चिनार देवदारु के, वृक्षों पर खूनों के छीटे हैं इस भव्य भासती झेलम के, तलहटी में माँओं के बेटे हैं इन सड़कों पर न जाने, कितनी गिरजा लूटी गयीं बलात्कार के अंत मे उनकी, देह से अतड़ियाँ नोची गयीं इन घर की पत्थर दीवारों पे, कलाश्निकोव की चोटे हैं जिसको मानते पितृ-सम्पदा, उसमें कितनी खोटे हैं तुम्हारे पाक पिता पुरखों ने, कितनी जानें ले लीं थीं वो अबोध बाल-बालायें, उनके अंक में खेली थीं तुम जो कहते सहिष्णुता हो, मन में घिन्न सी आती है उन वीभत्स यादों में खोकर, शिर की शिरा तन जाती है आज षष्टदश वर्षों में, थी जलती चिता जो बुझ गयी है उन कातर बालाओं की , चीखों को शान्ति जो मिल गयी है पर फिरसे तुम ये अन्देशा, अपने दिलों में पाल न लो ये जन्नत न होगी काफ़िर की, ऐसा तुम फिर मान न लो ये द्विसहस्रनवदश वर्ष है, बीती सदी की बात गयी इस सनातन की सुप्त वो ज्वाला, फिर से हिय में जाग गयी इस सहस्र रवि सी ज्वाला को, पुनः न बुझने देंगे हम जो पुनः उठे कभी अरि-नयन, तो नयन दग्ध कर देंगे हम ©देव #कश्मीर_एक_टीसती_पीड़ा ...