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अब जाकर

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अब जाकर खोई सब आशाएँ हमने अब जाकर तुमको खोये हैं हम अब जाकर आहिस्ता से छूटी जिंदगी अब जाकर तन्हा हो रोये हैं हम इस प्रेम डगर कुछ आस बचे जो कुछ दो पग चल ले मरकर आदम जो खो जाये मन से आस की ज्योति तो किस ओर तके अँधेरे आदम ।।काफ़िर।।

प्रेम-द्यूत

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#प्रेम_द्यूत प्रेम में जीता कौन है अबतक, सबकी अबतक हार हुई मीठा मीठा सबकी आशा, आस ये सबकी खार हुई द्यूत विकट है प्रेम ये बन्धु! पासा सदा एक ही लाये कितना भी तुम मन से खेलो, कैसे जीत भला हो पाये हँसने की देखो कोशिश करते, रोते रोते जी जाते हैं लोग यहाँ पर अमिय ढूँढते, तड़प के देखो मर जाते हैं मत कर पगले आस कस्तूरी, वन-वन भटक के रोयेगा उसके आस में जीवन खोके, निज को भी तू खोयेगा जिसकी पीड़ा भय की जाया, जिसके आँखों भय के आँसू प्रेम के अश्रू कैसे निकसे, थका मैं कहके छोड़ झिझक तू प्रेम पुनीत है, विरल है जग में, पावन हिय में बसता है लोभ तृषा के मोह में फँसके, मनुज अनाहक मरता है वासना के पंक में देखो, शूकर सा लोट लगाता है प्रेम का पावन पय निरख के, श्वान सा वह भग जाता है एक समय में दो दो बातें करता मैं पागल लगता हूँ परन्तु सत्य ये विचित्र है बन्धु, प्रेम किसीसे करता हूँ मनुज हृदय है, सदा सशंकित, प्रेम पकड़ के रोता है छोड़ गया था कभी जो तजके, उसीकी माला जपता है प्रेम में कैसी करें शिकायत, प्रिय की मूरत ईश यहाँ पर उसीकी धुन में बन बैरागी, भटके जग में यहाँ-वहाँ पर ©काफ़िर

कारिक-सुनन्दिनी -- गाथा जन्मों की - भाग-१

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#जन्मान्तर_भाग_१ कहते हैं ये कथा जिसने भी सुनाई, उसे ऐसे ही भाग्य से होकर गुजरना पड़ा है! आज काफ़िर ये कथा सुना रहा है, क्योंकि जो चिता से होकर गुजर चुका हो, उसे चिता से भय कैसा? जो सबकुछ खो चुका हो, उसे खोने का भय कैसा?  तो चलिए, सुनाते हैं वो कथा! जन्मान्तर- कथा जन्मों की- भाग-१ ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●  धू-धू कर जलती चिता से उठती लपटें, घनघोर वर्षा से भी शान्त नहीं हो रही थीं! जैसे लगता था कोई ऐसा लेटा है उस चिता में, जिसकी आत्मा की अगन शान्त ही नहीं होना चाहती, देह के शान्त हो जाने के पश्चात भी! उसी चिता के सम्मुख बैठा था एक मुण्डित मस्तक, गैरिक वस्त्रों में लिपटा, कहीं अपने में ही खोया एक सन्यासी सा दिखने वाला मनुज!   चिता की जलती लपटें वर्षा के झरते जल में भी स्पष्ट दिखते उसके झरते अश्रुओं से प्रतिबिम्बित होकर उसके गौरवर्ण मुख को एक अलग ही आभा दे रही थीं! यदि कोई सुन सकता तो सुनता उसके उन अधरों को कहते हुए... " हम अवश्य मिलेंगे नन्दिनी! महाकाल पशुपतिनाथ के चरणों में यदि एक पल को भी मेरी सच्ची श्रद्धा रही है! यदि उन्हें एक पल को भी निज प्राणों को अपूर्व श्रद्धा से अर्...

वीरक-वाणी - अंत

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श्रावण मास के पूर्णिमा का चाँद घने काले घहराते बादलों के बीच लुकाछिपी खेल रहा था। क्षणभर को दिखाई देता था, पुनः स्याह काले बादलों के पीछे चला जाता था! जैसे उसे शीघ्रता थी अंधेरे को चुन लेने की!   अपने घर के दूसरे तल की बालकनी में खड़ी वाणी चाँद के इस खेल को देखे जा रही थी!    " क्यों चले गए वीरक? क्यों? क्या एक पल भी अपनी वाणी का ध्यान नहीं आया?"  अभी स्टेशन पर घटी घटना को एक दिन ही हुए थे! वाणी के लिए विश्वास कर पाना भी कठिन था, असम्भव ही था कि वीरक नहीं रहा! कोई माध्यम भी तो नहीं था, कि ज्ञात हो कि हुआ क्या? कैसे हुआ? सबकुछ जो एक सपना लग रहा, क्या वह सत्य था? सब आँखों के सम्मुख ही तो हुआ था! शर्मा अंकल भी तो थे! " मुझे याद कर रही वाणी?" सहसा कानों में गूँजी वह आवाज, जिसे वाणी आजीवन सुबह-शाम सुनना चाहती थी! " वीरक?" " और कौन पगली?" वाणी ने मुड़कर रेलिंग के दाहिने छोर की ओर देखा तो सन्न रह गयी! हँसे कि रोये? खुश हो कि उलाहना दे? कुछ भी उसकी समझ में नहीं आ रहा था! सामने रेलिंग से पीठ टिकाये वह खड़ा था, जिसके सीने से लगकर एक-एक पल  बिताने का सोचा था व...

द्रोण भी मैं बन जाऊँगा!

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हे पुत्र तुम्हारे प्रेम-बद्ध, द्रोण भी मैं बन जाऊँगा गोधूम चूर्ण न बने भाग्य! चाकर भी बन जाऊँगा हो जिसे समझना जो कुछ भी, मुझे चिंतना तेरी है बने मनुज तू, धर्म जिये, पावन संस्कार दिलाऊँगा कर्म पथ तू बढ़े पुण्य के, नित नए प्रतिमान गढ़े परन्तु अहित जो तेरा हो, मैं रण विकट रचाऊँगा तू मान धरे कुल वसिष्ठ का, नित नए प्रतिमान गढ़े तेरे चरित्र को उज्ज्वल करने, प्रतिमान स्वयं बन जाऊँगा माधव सा हो पुत्र मेरा, ले आस तुम्हें मैं पोष रहा जो आतप-वर्षा-शीत सताये, शेषनाग बन जाऊँगा त्यागी हूँ मैं, लोभ परे, धन, यश की ना इच्छा है परन्तु तेरे पालन के हित, जीत स्वर्ग भी लाऊँगा कभी तुम्हारे दादा ने मुझे लिए जो स्वप्न गढ़े वही स्वप्न मैं पुत्र मेरे! थाती में दे जाऊँगा ©तुम्हारा पिता

ध्याऊँ कौन विधि?

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शरद की अमा! भगवती के चरणों में बैठा उनसे ही सम्मुख उन्हें निहारता प्रश्न उठे हैं मन में हे माँ! तुम्हें ढूँढा सर्वत्र रहती हो कहाँ? बसती हो किसमें? क्या रूप है तुम्हारा? हे माँ! कैसे ध्याऊँ तुम्हें? किस रूप में ध्याऊँ तुम्हें? प्रश्न उठता है! मथता है! क्या सर्वसुन्दरी? भुवनमोहिनी? विग्रह को शीश नवा उठा तो सम्मुख एक कुरूपा भिखारन एक सद्ययौवना नवब्याहता रूपवती लक्ष्मी संग-संग वहीं पड़ गया नतमस्तक! पुनः विचारा बालिका या षोडशी? दाहिने एक माँ! गोद में नवजात भवानी पार्श्व में षोडशी अश्रु बह चले! धन्य हो माँ! धन्य है भाग्य मेरा! पर पुनः जन्मा एक प्रश्न जन्मों का मारा, आज प्रश्नों का मारा श्यामा या गौरी? अनाहत गूँज! देख पगले! गोद में श्यामा! पार्श्व में गौरी! धन्य! धन्य! पर, मैं पामर! वही प्रश्नों का मारा कुमारी या प्रौढ़ा? स्पन्दन हृदय के बोल उठे! देख बावले! श्यामा और अङ्क लिए माँ! वाम पार्श्व में बैठी मातामह! यही विचारता चला जा रहा अपनी ही सुध में बेसुध शिरोवेदना! आते ही घर में,  पड़ा जननी की गोद में बन्द नयन घोर रयन क्या हो चयन? सर्वत्र है तू! सबमें है तू! इस अणु में! उस अनंत में! उस विभु ...

पिशाच

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तुम्हारी स्मृतियों पर पलने वाला  पिशाच हूँ मैं! जैसे किसी पिशाच का जीवन मानव-रक्त की उपलब्धता पर है ठीक वही तो हूँ मैं! तुम्हारी स्मृतियों पर पलता है जीवन मेरा! जैसे किसी पिशाच की शिराओं में दौड़ता है रक्त किसी और का और दौड़ती है  उसके जीवन की गाड़ी! ठीक वही तो है मेरी कथा रक्त बनकर दौड़ती हैं तुम्हारी स्मृतियाँ और दौड़ती लग रही है मेरी नाड़ी! जैसे मानव रक्त के बिना पीत वदन हो जाता है वह पिशाच मेरी भी होती है वही दशा कुछ न होने का आभास हर लेता है मेरे नयनों का प्रकाश नहीं सूझता कुछ जबतक पुनः इस हृदय की लपलपाती दीर्घ जिह्वा को दे न दूँ तुम्हारे स्मृतियों का प्राश अब तो साँसे भी क्षीण सी चलती हैं कभी धौकनी सी तेज कभी रुक रुक के झटके से उखड़ती हैं जब जब नहीं मिलता तुम्हारे स्मृतियों का साथ मन डूबता है उतराता है गर्त में गिरता जाता है खोजता है किनारा जहाँ होती हैं  स्मृतियाँ तुम्हारी तिनके का सहारा और, तुम्हारी स्मृतियों के  प्राशन पर जीवित रहता है स्मृतिभोजी ये पिशाच! चित्र गूगल से साभार